एसडीएम कोर्ट से फाइल गुम होने के पीछे क्या राज है। इस फाइल के गेम में मुख्य किरदार कौन है? दोनों पक्षों में समझौते के बाद भी उप जिलाधिकारी आरोपियों को क्यों जेल भेजना चाहते थे? बाद में बिना फाइल के ही एसडीएम ने जमानत कैसे दे दी। ऐसी क्या बात थी कि एचसीपी को जान देनी पड़ गई, ये सभी सवाल लोगों को परेशान कर रहे हैं। सवाल यह भी है कि इस सबके पीछे भ्रष्ट व्यवस्था तो जिम्मेदार नहीं है।
एसडीएम सदर की कोर्ट के हैड मोहर्रिर एचसीपी बिजेंद्र सिंह की मौत ने प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। बताया गया है कि भूराहेड़ी गांव में दो पक्षों के विवाद में पांच लोगों को पुलिस ने शांति भंग में गिरफ्तार कर एसडीएम राम अवतार गुप्ता के न्यायालय में पेश किया था। दोनों पक्षों में आपसी समझौते की बात होने पर भी एसडीएम पांचों लोगों को जेल भेजने पर अड़े थे। इनमें एक अधिवक्ता का पिता था। यह अधिवक्ता जब अपने साथ बड़ी संख्या में वकील ले आया तो उसके पिता को जमानत दे दी गई। इसी बीच मामले से संबंधित फाइल गुम हो गई। कोर्ट से फाइल गायब होना ही अपने आप में बड़ा मामला है।
जमानत देने से मना कर रहे एसडीएम ने जब वकीलों को बड़ी संख्या में देखा तो बिना फाइल के पांचों को जमानत दे दी। वकीलों के सामने फाइल गुम होने का ठीकरा एचसीपी बिजेंद्र सिंह के सिर फोड़ा गया। बिजेंद्र का आरोप यह था कि एसडीएम आरोपियों को जमानत नहीं देना चाहते थे, उन्होंने जानबूझकर फाइल गायब कराई। आत्महत्या से पहले सुसाइड नोट में भी उसने इसी बात का जिक्र किया है। अपने ऊपर लगे फाइल चोरी के आरोप से आहत बिजेंद्र सिंह ने जान तो दे दी, लेकिन फाइल गुम होने का सच सामने नहीं आया। मेरठ पुलिस ने मुकदमा दर्ज होने के बाद जांच शुुरू कर दी है और इस प्रकरण की सच्चाई भी धीरे-धीरे सामने आएगी।
फाइल गुम होने का मुकदमा क्यों नहीं लिखवाया
एसडीएम के न्यायालय से फाइल गायब होने का मामला गंभीर है। एसडीएम रामअवतार गुप्ता ने इसमें मुकदमा दर्ज क्यों नहीं कराया। सूत्रों का तो यहां तक कहना है कि एक दो दिन में फाइल अपने आप सामने आ सकती है। यही कारण है कि रिपोर्ट नहीं लिखाई गई।