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कोरोना की बंदिश में बच्चों के जीने का अंदाज बदला

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कोरोना की बंदिश में बच्चों के जीने का अंदाज बदला
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मुजफ्फरनगर। घर में कैद रहने से बोझिल हो गई जिंदगी से छात्र-छात्राओं और अभिभावकों पर तनाव बढ़ने लगा है। कोरोना की दूसरी लहर की रफ्तार धीमी पड़ने पर संभावित तीसरी लहर की आशंका से हर कोई चिंतित हैं। कोरोना में सवा साल से बच्चे घर से पढ़ाई करने से उब चुके हैं। परिजनों के पहरे में रहना आदत बन गया है। कोरोना की बंदिश में बच्चों के जीने का अंदाज बदल गया है।
क्या कहते हैं चिकित्सक
नकारात्मकता छोड़े, काउंसिलिंग है बच्चों का इलाज
कोरोना के लंबी अवधि के बाद डिप्रेशन आदि की समस्याएं बढ़ेंगी। इनसे बचने के लिए नकारात्मकता को छोड़कर पॉजिटिव सोच के बच्चों को प्रेरित करना होगा। मोबाइल फोन पर पढ़ाई से ज्यादा आक्रामक गेम और पिक्चर देखने की प्रवृत्ति बच्चों को हिंसक बना सकती है। इससे बचने के लिए बच्चों की काउंसलिंग कराने की जरूरत है।
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डॉ. लोकेश चंद्र गुप्ता, जिला क्षय रोग अधिकारी, बाल रोग विशेषज्ञ
बच्चों का तनाव कम करने के टिप्स:
बच्चों की काउंसिलिंग कराएं
दवाओं से ज्यादा मार्गदर्शन की जरूरत
बच्चों के साथ अधिक समय बिताएं
सोशल मीडिया की नकारात्मक खबरों से बचें
गांवों में कारगर नहीं ऑनलाइन पढ़ाई
विद्यार्थियों की ऑनलाइन पढ़ाई करना गांवों में कारगर नहीं हो पाती है। बच्चों के साथ माता-पिता चिंतित रहते हैं। स्कूल कॉलेजों में सामाजिक दूरी बनाते हुए खोलने से खुला माहौल मिलेगा और क्लास में पढ़ाई से तनाव कम होगा। बच्चों में तनाव रहेगा, तो इम्यूनिटी पॉवर कम होगी।
डॉ. सुरेश चंद त्यागी वरिष्ठ फिजिशयन
रातभर मोबाइल से चिपके रहते हैं बच्चे
यमन कुमार एडवोकेट कहते हैं कि उनका बेटा गौरव कक्षा 11 में पढ़ता है। कमजोर नेटवर्क दिक्कत बढ़ाती है। रातभर मोबाइल फोन से चिपके रहना उसकी आदत में शुमार हो गया है।
बेटे की जिद्द के सामने हैं बेबस
कसौली निवासी शिक्षक मामचंद पुंडीर बताते हैं बेटा शक्ति कक्षा 12 में पढ़ता है। फिलहाल कोरोना की पाबंदी में वह पढ़ाई कम और गेम खेलने की तरफ रुचि लेता है। इस लत से उसके भविष्य की चिंता सताने लगती है।
खानपान से ज्यादा मोबाइल बन गई जिंदगी
इंटरमीडिएट साइंस के छात्र मानवेंद्र राणा इस बात से परेशान हैं कि ऑनलाइन पढ़ाई से मोबाइल फोन अधिकांश समय चलाने की लत पड़ गई है। आंख खुलते ही मोबाइल पर हाथ जाता है। आंखों में दिक्कत आने लगी है। खाने-पीने से ज्यादा मोबाइल जिंदगी का सहारा से बन गया है।
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गेम और पिक्चर देखना बन गई आदत
कसौली के छात्र उदित पुंडीर कहते हैं सालभर से ज्यादा ऑनलाइन पढ़ाई से परेशानी हुई है। नेटवर्क की दिक्कत से खाली समय में अंगुलियां गेम और पिक्चर पर खुद नाचने लगती है। खाने का कोई समय नहीं रहा। 12-14 घंटे मोबाइल चलाने का शौक पड़ गया है।
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