काश हर कोई समझ ले अपनी जिम्मेदारी
वर्ष 2015 में मुजफ्फरनगर जिला अस्पताल में दस बेड का पोषण एवं पुनर्वास केंद्र (एनआरसी) शुरू हुआ। जब हम एनआरसी पहुंचे तो दो बच्चे भर्ती थे और आठ बेड खाली पड़े थे। मौके पर मौजूद चिकित्सक ने हमें वह पत्र दिखाया जो दस दिन पहले ही उन्होंने सीएमओ को कुपोषित बच्चों को सेंटर में भर्ती कराने के संबंध में लिखा था। जिसमें लिखा गया कि अगर ओपीडी व आंगनबाड़ी से नियमित बच्चे आएं तो प्रतिवर्ष 300 से 350 बच्चों को कुपोषण से बाहर निकाला जा सकता है। बीते छह वर्ष में सिर्फ 2019 में ही 244 बच्चे यहां से स्वस्थ होकर निकले। बाकी वर्षों में सेंटर की पूरी क्षमता का इस्तेमाल नहीं हुआ।
मिलकर प्रयास जरूरी...
कुपोषण के खिलाफ लड़ाई को जीतना है तो चौतरफा प्रयास जरूरी हैं। 25 फीसदी मामलों में देखा गया है कि बच्चों के बीच उम्र का अंतर बेहद कम होता है। मां स्वस्थ नहीं होती है तो बच्चा कुपोषित होना का खतरा रहता है। कुपोषण पर जीत के लिए महिलाओं को भी जागरूक करना होगा । उन्हें यह समझना होगा कि दो बच्चों के बीच तीन साल का अंतर जरूरी है। - डॉ. आरती ननदवार, इंचार्ज, पोषण एवं पुनर्वास केंद्र
जिले में पांच प्रतिशत से अधिक कुपोषित
- जिले में पांच वर्ष तक की आयु के 242832 बच्चे।
- विभाग ने शून्य से पांच वर्ष तक 220908 यानी 90.97 प्रतिशत का वजन किया ।
- 10582 बच्चे कुपोषित और 1816 बच्चे अतिकुपोषित मिले।
- 5.61 प्रतिशत बच्चों को जांच के बाद कुपोषण की श्रेणी में माना गया।
महिलाओं में खून की कमी
तीन वर्षों में 95 महिलाओं की प्रसव के दौरान मौत हुई। हालांकि साल दर साल सुधार आया है। इन मौतों के पीछे एक बड़ा कारण एनीमिक होना भी माना गया। एक से 12 महीने तक के बच्चों ने बीते तीन वर्षों में जान गवाई हैं। इनके पीछे भी गर्भावस्था में महिला के एनीमिक होने को माना गया, जिससे नवजात कुपोषित पैदा हुए।
जिले में इतनी एनीमिक महिलाएं
| वर्ष |
महिलाएं |
| 2017-18 |
2776 |
| 2019-20 |
2903 |
| अक्तूबर 2020 तक |
791 |