मुजफ्फरनगर, 14 मई। पिछले लोकसभा चुनाव में जीत के साथ पहली बार सीट पर कब्जा करने वाली बसपा के हाथी की चाल का इस बार इम्तिहान है। मोदी लहर में मुस्लिम कार्ड पर भरोसा करने वाली बसपा के लिए नतीजे महत्वपूर्ण रहेंगे। सांसद कादिर राना ने वर्ष 2009 में भाजपा और रालोद गठबंधन की अनुराधा चौधरी को हराकर जीत हासिल की थी।
मतगणना के वक्त की उलटी गिनती का दौर शुरू हो चुका है। वर्तमान में मुजफ्फरनगर सीट पर बसपा का कब्जा है। दंगे के बाद बदले माहौल के बावजूद बसपा सुप्रीमो मायावती ने मुस्लिम कार्ड पर भरोसा जताते हुए सांसद कादिर राना को ही टिकट दिया था। तर्क यह भी था कि बसपा के बेस वोटर ने अगर कादिर राना को वोट कर दिया तो जीत का रास्ता साफ हो जाएगा। जाट-मुस्लिम गठजोड़ टूट जाने के बाद दलित-मुस्लिम गठजोड़ को बनाने की कवायद की गई थी। विश्लेषक हाथी की चाल को सुस्त बताते दिख रहे हैं, लेकिन वास्तविकता 16 मई को ही सामने आएगी। वर्ष 2009 में कादिर राना ने 2,75,318 वोट हासिल कर भाजपा-रालोद की अनुराधा चौधरी को 25 हजार 98 मतों से हराकर करिश्मा किया था। चरथावल विधानसभा से जीतकर संसद पहुंचे कादिर राना के लिए कई मुश्किलें हैं। दलित-मुस्लिम गठजोड़ कामयाब नहीं हुआ तो विधानसभा चुनाव 2017 में बसपा रणनीति बदल सकती है। समय-समय पर हाथी दलित वोटरों के मिजाज के हिसाब से चाल बदलता रहा है, ऐसे में रिजल्ट के बाद बसपा की सियासत में भी बदलाव हो सकता है।
कैराना में कैसे बचेगी सीट?
वर्ष 2009 में दिवंगत सांसद मुनव्वर हसन की बेगम तबस्सुम बेगम ने भाजपा विधायक हुकुम सिंह को पराजित कर संसद की राह पकड़ी थी। इस बार बसपा ने तबस्सुम बेगम के बजाए टिकट उनके देवर कंवर हसन को दिया। मुकाबला इस बार भाजपा विधानमंडल दल के नेता हुुकुम सिंह से ही है। सवाल यह कि क्या यहां बसपा अपनी साख को बचा पाएगी या नहीं।