देवबंद (सहारनपुर)। योगी सरकार की एक धर्म के साधु संतों को पेंशन दिए जाने की घोषणा करने पर देवबंदी उलमा ने सख्त ऐतराज उठाया है। उलमा का कहना है कि जब मुल्क को सेक्युलर मानते हो तो फिर एक धर्म के बजाए हर मजहब के साधु संतों को पेंशन का लाभ मिलना चाहिए। अगर ऐसा नहीं होता तो साफ है कि योगी सरकार का यह फैसला फिरकापरस्ती की बुनियाद पर लिया जा रहा है।
दारुल उलूम फारुकिया के मोहतमिम मौलाना नूरुलहुदा कासमी ने कहा कि योगी सरकार अगर एक ही मजहब के साधु संतों को पेंशन देने का मन बना रही तो साफ है कि यह फैसला फिरकापरस्ती की बुनियाद पर लिया जा रहा है। जबकि हर मजहब में साधु संत मौजूद हैं। हिंदू धर्म में उन्हें साधु संत कहते हैं, मुस्लिम धर्म में उन्हें मौलवी या मौलाना, जबकि इसाई धर्म में उन्हें पादरी कहा जाता है, लेकिन यह सभी मजहबी साधु संत होते हैं। उन्होंने कहा कि अगर वह मुल्क को सेक्युलर मानते हैं तो हर धर्म के साधु संतों को पेंशन देनी चाहिए। मजलिस इत्तेहाद-ए-मिल्लत के अध्यक्ष मुफ्ती अहमद गौड़ का कहना है कि योगी सरकार का साधु संतों को पेंशन देने का निर्णय बहुत अच्छा है, लेकिन उन्हें यह याद रखना चाहिए कि देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नारा दिया है कि सबका साथ सबका विकास इसी नारे पर आज बीजेपी सत्ता में बैठी हुई है। यदि एक धर्म के मानने वाले साधु संतों को पेंशन दी जाती है तो यह दूसरे मजहब के धर्म गुरुओं और सूफी संतों के साथ भेदभाव और सौतेला व्यवहार होगा। इसलिए सरकार को चाहिए कि वह भेदभाव न करके सभी धर्मों के गुरुओं और सूफी संतों को पेंशन का लाभ दें।