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वीर अब्दुल हमीद के साथ पाक के उड़ाए थे पेंटर्न टैंक

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अथाई के वेदपाल सिंह ने पाक के विरुद्ध लड़ी थी लड़ाई
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भोपा। भोपा के गांव अथाई निवासी पूर्व सैनिक वेदपाल सिंह ने पाकिस्तान के खिलाफ 1958 के अलावा 1965 और 1971 की सभी लड़ाई लड़ी थी। उन्होंने परमवीर चक्र विजेता वीर अब्दुल हमीद के साथ मिल कर पाकिस्तान के टैंकों को उड़ाया था।
गांव अथाई निवासी 83 वर्षीय वेदपाल सिंह वर्ष 1958 में आर्मी की फोर ग्रेनेडियर टीम में भर्ती हुए थे। पाक के विरुद्ध लड़ी गई 1965 की लड़ाई का जिक्र करते हुए वे बताते हैं कि उनकी बटालियन पाक के सीमावर्ती क्षेत्र खेमकरण सेक्टर में तैनात थे। कंपनी क्वार्टर मास्टर हवलदार परमवीर अब्दुल हमीद की टीम में वे ग्रेनेडियर थे। उसी दौरान पाक ने अमेरिका से शक्तिशाली चार पैटर्न नामक टैंक खरीदे थे। युद्ध में उनका इस्तेमाल किया जा रहा था। उसी दौरान वीर अब्दुल हमीद ने पाक के उन चार टैंकों में से दो को गोले दाग कर नष्ट कर दिया था। तीसरे पैटर्न टैंक को तोड़ने के समय वे वीरगति को प्राप्त हो गए थे। वे भी उस समय चंद कदमों की दूरी पर मोर्चा थामे पाक सेना व टैंकों पर ग्रेनेड दाग रहे थे। उन्होंने बताया कि वीर अब्दुल हमीद उनसे बहुत स्नेह रखते थे। 1971 में भारत-पाक युद्ध व बांग्लादेश निर्माण के समय भी वो युद्ध में अग्रणी रहे। 1962 में एक बार चीन सीमा के गरीब इच्छोगल( तिब्बत ) में उनकी टीम रास्ता भटक गई थी। उसी दौरान एक तिब्बती युवक से उन्होंने रास्ता पूछा. तो उसने रास्ता बताने के बदले उनसे उनका कंबल मांगा। भरी सर्दी में वेदपाल ने उस व्यक्ति को अपना कंबल दिया था। उसके बाद वह टीम के साथ सुरक्षित स्थान पर पहुंचे थे। पूर्व सैनिक के इकलौते बेटे रविंद्र सिंह व पौत्र कुश चौधरी बताते हैं कि इस उम्र में भी वो अपने आवश्यक कार्य खुद ही करते है।
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सरकार से पाक के विरुद्ध सख्त कार्रवाई की मांग
भोपा। पूर्व सैनिक वेदपाल सिंह कहते है किसी भी देश की असली शक्ति उसके सैनिकों के मनोबल में होती है, न की मशीनरी में। सरकार को अपने सैनिकों के मनोबल को और बढ़ाना होगा। उन्होंने पाक को धोखेबाज बताते हुए उसके विरुद्ध कड़ी कार्रवाई की मांग सरकार से की। जांबाज अभिनंदन के भारत लौटने पर हर्ष जाहिर किया हैं।
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बहन के ससुर से मिली थी सेना में जाने की प्रेरणा
भोपा। वेदपाल सिंह की छोटी बहन ओमकारी की ससुराल देवबंद के गांव गुनारसा में थी। वे बताते हैं कि वह अपनी बहन से मिलने के लिए गुनारसा गए थे। उसी दौरान बहन के ससुर ने सेना भर्ती होने की बात कही तो वह अगले ही दिन नसीराबाद भर्ती में पहुंच गए, जहां उन्हें सेना में भर्ती कर लिया गया। उन्हें वेतन के रूप में मात्र ढाई रुपये प्रतिमाह मिलता था। उनका कहना है कि वे वेतन के लिए नहीं, वतन के लिए सेना में भर्ती हुए थे।
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