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शौर्य की गाथा लिख गए वीर सपूत

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मुजफ्फरनगर। शौर्य के शिखर के आगे पहाड़ जैसी दुश्मन सेना की चुनौतियां बौनी हो गई थी। भारत मां के सपूतों ने दुश्मनों के दांत खट्टे कर कदम पीछे हटाने पर मजबूर करते हुए शौर्य की नई गाथा लिखी। पहाड़ की चोटियों से निशाना बना रही दुश्मन सेना पर जवान टूट पड़े थे। दुश्मन सैनिकों को मार गिराकर भारतीय फौज ने काक्षर, तोलोलिंग और टाइगर हिल पर कब्जा किया। कारगिल युद्ध में जिले के पांच वीर योद्धाओं ने देश के लिए प्राण न्योछावर किए थे, जिनकी शहादत पर जिला गौरवान्वित है।
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जनपद के गांव पचेंडा निवासी लांस नायक बचन सिंह द्वितीय राजपूताना रायफल में तैनात थे। 12 जून 1999 की रात्रि दुश्मनों ने हमला बोल दिया। पहाड़ की चोटियों पर बैठा दुश्मन पल-पल हरकत देखकर गोलियों की बौछार कर रहा था, तभी राजपूताना रायफल को तोलोलिंग पर कब्जा करने का आदेश हुआ। गोलियों की बौछार पर भी भारत मां के सपूतों के कदम नहीं रुके। जांबाज वीरों ने दुश्मन के दांत खट्टे कर तोलोलिंग पहाड़ी पर कब्जा किया। यहीं पर दुश्मन की गोलियां लगने से लांसनायक बचन सिंह शहीद हो गए। कारगिल युद्ध में शहीद लांसनायक बचन के दो पुत्र हेमंत और हितेष हैं। बेटा इंडियन आर्मी में ही देहरादून ट्रेनिंग पर है, जबकि दूसरा बेटा भी बाहर जॉब करता है। पत्नी कामेश बाला शहर की आदर्श कालोनी में रहती हैं। हालांकि शहीद के परिवार को केंद्र सरकार की ओर से एक पेट्रोल पंप और दिल्ली द्वारिकापुरी में आवास दिया गया था। युद्ध को याद करते हुए कामेश बाला कहती हैं कि पाकिस्तान की नापाक हरकतों का मुंहतोड़ जवाब दिया जाना चाहिए। भारत सैन्य शक्ति में पाक से कहीं अधिक मुकम्मल है, लेकिन हर बार उसकी हरकतों पर बयानबाजी होकर रह जाती है।
लहूलुहान थे, लेकिन मिशन पर डटे रहे
(फोटो समाचार)
बुढ़ाना। गांव विज्ञाना का रहने वाले रिजवान त्यागी कारगिल युद्ध में ऑपरेशन विजय के दौरान दुश्मनों से लोहा लेते समय घायल हो गए थे, लेकिन मिशन पर डटे रहे। अंत में देश पर प्राण न्योछावर कर शौर्य गाथा लिखी। खालूबार शिखर पर रिजवान त्यागी ने अपने साथियों के साथ कब्जा करने के लिए छह जुलाई को दुश्मनों पर हमला बोल दिया था। चोटियों से गोलियां और धुंध होने के कारण राह मुश्किल हो गई, मगर दुश्मनों पर टूट पड़ने का जज्बा नहीं हिल सका। दुश्मनों द्वारा फेंके गए हथगोले से ग्रेनेडियर रिजवान त्यागी के हाथ-पैर जख्मी हो गए। उसके बाद भी उन्होंने दुश्मनों का सामना किया और अंत में वीरगति को प्राप्त हो गए। शहीद रिजवान त्यागी की पत्नी शबनम बानो को पति की शहादत पर गर्व है। कहती हैं कि सरकार ने उन्हें बहुत कुछ दिया है। परिवार सम्मान से सिर उठाकर जीता है। सरकार को चाहिए कि सीमा पर जवानों की शहादत को रोका जाए। दुश्मन की गोली का गोली से जवाब मिले। शहीद की बेटी हिना रिजवान बीएससी की छात्रा है।
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नरेंद्र राठी की शहादत पर गर्व
(फोटो)
बुढ़ाना। गांव इटावा निवासी नरेंद्र राठी को कारगिल में दुश्मनों से काक्षर पहाड़ी पर लोहा लेते समय शहादत प्राप्त हुई थी। इटावा के लाल ने दुश्मनों पर आक्रमण कर पांच जून 1999 को गोलियों का जवाब गोलियों से दिया। दुश्मन टुकड़ी ने उन पर बमों से हमला बोल दिया, जिसमें नरेंद्र राठी शहीद हुए। शहीद नरेंद्र राठी की पत्नी अनीता कहती हैं कि उम्रभर उनकी कमी खलेगी, मगर देश के लिए प्राण न्योछावर करने पर गर्व है। कहा कि दुश्मन आज भी भारतीय सेना को निशाना बना रहा है। इसका जवाब सरकार को उसकी भाषा में देने की जरूरत है। पाक की आतंकी गतिविधियों में कश्मीर और देश के अन्य प्रांतों को अशांत और असुरक्षित कर दिया है। मोदी सरकार को आतंकियों और उन्हें पनाह देने वालों के खिलाफ कठोर कार्रवाई करनी चाहिए। बेटा सुमित राठी बीटेक कर चुका है और नोएडा में जॉब कर रहा है। बेटी स्वाति एयर होस्टेस की ट्रेनिंग कर रही है।
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अंतिम सांस तक लड़ते रहे सतीश
(फोटो)
खतौली। गांव फुलत निवासी सतीश कुमार 238 इंजीनियर रेजिमेंट में शामिल थे। कारगिल युद्ध में रेजिमेंट को बंकरों और पहाड़ियों के रास्ते से दुश्मन को मार गिराने के आदेश हुए थे। इस पर रेजिमेंट ने मोर्चा संभाला और आगे बढ़ी। वीर योद्धा सतीश ने भी दुश्मनों से लोहा लिया, लेकिन गोलियों की बौछार में शहीद हो गए। पिता धर्मपाल कहते हैं कि सतीश की शहादत पर पूरे गांव को फक्र है। उम्रभर उसकी कमी खलेगी, लेकिन सरकारों का सैनिक परिवारों के प्रति रवैया ठीक न होने की टीस है। कारगिल युद्ध में सतीश कुमार के शहीद होने के बाद रिश्तेदारों और परिवार के लोगों ने शहीद की विधवा पत्नी बिमलेश की शादी देवर शिवकुमार से कर दी थी। पिता कहते हैं कि सरकार ने दो साल तक शहीद की मां नत्थो को 2500 रुपये माह बतौर पेंशन दी, लेकिन बाद में बंद कर दिया। गैस एजेंसी मिली थी, उसे भी निरस्त कर दिया गया। सैनिकों के परिवारों के लिए अलग से बजट रखने की जरूरत है।
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दुश्मनों पर टूट पड़े थे अमरेश
(फोटो)
भोपा। भोपा के गांव बेलड़ा निवासी अमरेश पाल 12 माहर रेजिमेंट में भर्ती हुए थे। कारगिल युद्ध में दुश्मनों से लोहा लेते हुए अमरेश ने दांत खट्टे कर दिए थे। पहाड़ियों पर रस्सा लेकर चढ़ते सैनिकों पर दुश्मन सैनिक गोलियों की बौछार कर रहे थे। भारत के वीर जांबाज आगे बढ़ते रहे। 28 जून 1999 को अमरेश पाल कारगिल की पहाड़ियों पर दुश्मनों के छक्के छुड़ाते हुए वीरगति को प्राप्त हो गए थे। अमरेश पाल कारगिल का युद्ध होने से पहले घर छुट्टी पर आए हुए थे, लेकिन सेना के आदेश के बाद तुरंत लौट गए, जहां देश की रक्षा करते हुए उनकी शहादत हुई। पिता फूल सिंह और माता अतरकली गांव के छोटे से मेहनतकश किसान हैं। अमरेश पाल के शहीद होने के बाद पूरा परिवार मुजफ्फरनगर चला गया था। शहीद अमरेश का बड़ा बेटा बंटी बीएससी और छोटी बेटी ज्योति ने कक्षा 12 पास की है। पत्नी उमाकांता देवर नेत्रपाल के साथ जानसठ स्थित गैस एजेंसी का कार्य देखती हैं। पिता फूलसिंह कहते हैं कि बेटे की शहादत पर उन्हें गर्व है, लेकिन सरकार के प्रति रोष है। उनके बेटे की याद में भोपा नहर गंगनहर पुल पर शहीद अमरेश पाल के नाम से द्वार बनाया जाना था, जो आज तक नहीं बन सका है।
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