आचार्य अभयदेव ने जलाई थी आजादी की अलख
चरथावल। चरथावल की भूमि को धन्य करने करने वाले आचार्य अभयदेव का यशोगान इतिहास के पन्नों में आज भी महक रहा है। गुरुकुल कांगड़ी में अध्यापन के दौरान आचार्य से महात्मा गांधी भी सम्मोहित हो गए थे। फिरंगी दौर में उन्होंने स्वाधीनता संग्राम में हिस्सा लेकर नौजवानों में स्वदेशी भावना जगाने में अहम भूमिका निभाई। सोमवार (आज) को उनकी जन्मदिवस के मौके पर आयोजित समारोह में चरथावल अरविंद निकेतन में कई जिलों से अनुयायी जुटेंगे।
चरथावल कस्बे में महान योगी आचार्य अभयदेव का जन्म दो जुलाई 1896 को हुआ था। रामप्रसाद और उनकी पत्नी हरि कुंवर दंपति की झोली में प्रभु ने देव स्वरूप ऐसा वरदान दिया कि बचपन का नाम देव शर्मा ही लिया गया। महर्षि दयानंद की प्रेरणा से कुशाग्र बुद्धि के धनी देव को उनके पिता सात वर्ष की आयु में ही स्वामी श्रद्धानंद द्वारा स्थापित गुरुकल कांगड़ी हरिद्वार छोड़ आए थे, जहां उनमें छिपी क्षमताओं को देख स्वामी श्रद्धानंद ने ही उन्हें अभयदेव का नाम दिया। आचार्य की आत्म कथा में स्वाधीनता संग्राम सेनानी गणेश शंकर विद्यार्थी, सरदार भगत सिंह समेत कई शहीदों के साथ सानिध्य का जिक्र है। स्वामी श्रद्धानंद ने उनमें छिपी क्षमताओं का दर्शन कर वेद उपाध्याय के रूप में नियुक्त कर दिया। वहां वैदिक शिक्षा के साथ योग साधना का अंगीकृत कर तेजस्वी पथ पर बढ़ते गए। गुरुकुल में आए महात्मा गांधी उनसे इतने प्रभावित होकर लौटे कि विदा से पहले वर्धा आश्रम में आने का न्योता दे दिया। वर्धा में आचार्य के ओजस्वी व्याख्यान की छाप जीवन भर बापू के ह्दय में समाई रही। उनके अनुयायी विजयपाल और कुबेर दत्त त्यागी बताते हैं कि आचार्य ने देश में योग और आध्यात्मिकता की गंगा बहाई थी। सोमवार का जन्म दिन काफी तादात उनकी समाधि पर नतमस्तक होने पहुंचेंगे।
वैदिक साहित्य ने बिखेरी थी ज्योति
चरथावल। आर्य विद्वान आचार्य गुरुदत्त आर्य बताते हैं कि ब्रह्मचर्य में तपे मनस्वी देश के प्रकांड विद्वानों की पंक्ति में आ गए थे। 360 वेदमंत्रों की व्याख्या कर उन्होंने वैदिक विनय अमर पुस्तक लिखी। ब्रह्मचर्य गीत, यज्ञ और योग, तरंगित ह्दय और एक योग यात्री की आत्मकथा जैसी अनेक कृति दी। उन्होंने पुडुंचेरी आश्रम में अदिति नामक पत्रिका का संपादन कार्य किया। उनके अनुरोध पर तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने यहां स्थापित गोशाला के 2.50 लाख का अनुदान दिलाया था।