27 अगस्त और 7 सितंबर, यही वह दो मनहूस तारीखें हैं जिनकी वजह से मुजफ्फरनगर में नफरत फैली। कवाल से शुरू हुए इस खूनी खेल ने जिला ही नहीं, देशभर को शर्मसार कर दिया।
कर्फ्यू का डंक यहां के बाशिंदों को झेलना पड़ा, गनीमत है कि नफरत की वजह बनी तीनों जगहों पर अब सुकून और शांति है। लोग एक दूसरे से मिलने लगे हैं। उनके दुख दर्द को महसूस करने लगे हैं।
कवाल ...तब
27 अगस्त को छेड़छाड़ को लेकर हुए संघर्ष में शाहनवाज की हत्या कर दी गई। मृतक पक्ष के लोगों ने हत्या कर भाग रहे सचिन और गौरव को भी मार डाला। ऐसा दोनों पक्षों का दावा है। इसके बाद तीन दिन कवाल सुलगता रहा। दो मजहब के लोग एक-दूसरे के दुश्मन बन गए। इस नफरत में आगजनी, फायरिंग, मारपीट और उपद्रव हुआ। गांव से लोग पलायन तक कर गए।
कवाल ...अब
10 सितंबर...दोपहर डेढ़ बजे गांव में एकदम सुकून है। दोनों वर्ग के लोग अपने काम में लगे हैं। गांव में मुख्य प्रवेश मार्ग पर पुलिस के जवान जरूर ऐहतियातन डटे हैं। गांव के भीतर और बाहर दुकानें खुली हुई हैं। मुख्य बाजार में बैठे शीशपाल हों या फिर गांव में रहने वाले मंशी यूनुस। इनका कहना है कि गांव में कोई कसीदगी नहीं है। नफरत खत्म हो गई है। सभी लोग एक-दूसरे से मिल रहे हैं। हां, इतना जरूर है कि हरे जख्म भरने में वक्त जरूर लगेगा। अफसोस है कि सदियों से मोहब्बत से साथ रहते-रहते एकाएक किसकी नजर गांव के सुकून को लग गई।
अलमासपुर...तब
सात सितंबर के दूसरे पहर तक जिंदगी सामान्य थी। तीसरे पहर एकाएक अमन के दुश्मनों ने हमला बोल दिया। किसी को कुछ नहीं पता, कब शांति भंग हो गई। अचानक गोलियों की तड़तड़ाहट से इलाका गूंज उठा। शोर-शराबे के बाद भगदड़ मच गई। पुलिस के आने पर दोनों पक्षों के लोग घरों में कैद हो गए थे।
अलमासपुर....अब
शेरपुर से अलमासपुर गांव तक मंगलवार दोपहर सबकुछ सामान्य दिखा। लोग अपने काम-काज में व्यस्त थे। एक दूसरे के इलाके में आ-जा रहे थे। मिस्त्री अकरम कहते हैं कि गांव में दोनों संप्रदाय के बीच किसी तरह का मनमुटाव नहीं है। उपद्रव में स्थानीय लोगों का हाथ नहीं है। शरारती तत्व बाहरी थे।
नंगला मंदौड़...तब
सात सितंबर को बहू-बेटी सम्मान बचाओ महापंचायत को लेकर यहां लाखों की भीड़ थी। सड़कों पर दूर तक सिर ही सिर थे। इज्जत की खातिर हर किसी के चेहरे पर गुस्सा था। बेगुनाहों को गुनहगार साबित करने पर नाराजगी झलक रही थी। शासन-प्रशासन के खिलाफ मुट्ठी भिंची थी। इसी पंचायत के बाद लौटते समय कई जगह संघर्ष हुआ और अमन झुलसता गया।
नंगला मंदौड़...अब
भारतीय इंटर कॉलेज के मैदान और सड़क की तस्वीर मंगलवार को बदली थी। मैदान पर सन्नाटा और सड़कें सूनी थी। कॉलेज बंद था, लेकिन खेतों में किसान और मजदूर कामों में जुटे थे। सुंदर बताते हैं कि अब शांति है और गुस्से में कमी है। सब लोग काम पर निकल पडे़ हैं। अफवाहों से जरूर कई बार डर पैदा होता है। उम्मीद जताई कि जिले में जल्द ही यह उन्माद थम जाएगा।