गंगा और यमुना को बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट के साथ ही प्रदेश की योगी सरकार भी सख्त है। लेकिन गंगा - यमुना के अलावा भी प्रदेश में डेढ़ सौ से अधिक अन्य छोटी - बड़ी नदियां बहती हैं, जिनकी ओर किसी का ध्यान नहीं है। मुरादाबाद जिले में भी चार नदियां बहती हैं जिनमें रामगंगा, गांगन, ढेला और कोसी शामिल हैं।
जिनके किनारे पक्के अवैध निर्माण धड़ल्ले से हो रहे हैं और बाढ़ खंड ने अपनी जिम्मेदारियों से मुंह फेर लिया है। सबसे ज्यादा बुरी हालत गांगन नदी है जो कमोबेश पूरी तरह कंकरीट के जंगल में तब्दील हो चुकी है। ढेला नदी का भी वजूद खतरे में है।
दिल्ली रोड पर गांगन नदी से एकदम सटाकर बड़ी - बड़ी सैकड़ों फैक्ट्रियां बन चुकी हैं। इनमें से कई फैक्ट्री को सीधे गांगन नदी की धार में बनी हैं। दिल्ली रोड पर गांगन तिराहे से लेकर कटघर में आरटीओ तक गांगन की धार कई जगह महज नालियों में सिमटकर रह गई है।
इसी तरह संभल रोड पर गांगन नदी का वजूद पूरी तरह सिमट चुका है। यहां करुला से लेकर गांगन पुल तक बड़ी - बड़ी फैक्ट्रियों के साथ ही सैकड़ों की तादाद में मकान - दुकान भी गांगन की धार में ही बने हैं।
जबकि शर्त यह है कि नदी किनारे 85 मीटर की दूरी तक कोई निर्माण नहीं होने दिया जाए। जबकि करुला की पूरी आबादी गांगन नदी की धार में बस चुकी है। यहां करीब दो हजार से अधिक मकान गांगन नदी की धार में बन चुके हैं और गांगन नाले की शक्ल में सिमट चुकी है।
लेकिन यहां न तो बाढ़ खंड ने अस्थायी बंधा बनाकर गांगन को बचाने की कोशिश की और न ही अवैध निर्माणों पर कोई अंकुश लगाया है। इलेक्ट्रानिक कचरा जलाने की सबसे ज्यादा घटनाएं भी गांगन के किनारे ही हो रही हैं।