मुरादाबाद कारागार से बंदियों को लेकर चंदौसी जिला न्यायालय में पुलिस जिस वैन से कैदियों को पेशी के लिए लाया गया था। उस वैन में सेल्फ स्टार्ट नहीं था। जब बंदी भाग गए और वैन को लेकर पुलिस बनियाठेर थाने पहुंची। करीब तीन घंटे बाद जब बदियों की वैन को मुरादाबाद ले जाने की जरूरत पड़ी तो वह स्टार्ट ही नहीं हो रही थी। दस पंद्रह सिपाहियों को बनियाठेर थाने में धक्का लगाना पड़ा। तब कहीं जाकर वैन आगे बढ़ी। पुलिस अधिकारियों की सुरक्षा में वैन को मुरादाबाद के लिए रवाना किया गया।
थाना बनियाठेर परिसर से रात्रि में 8.32 बजे वैन को मुरादाबाद ले जाने की तैयारी की गई। चालक ने वैन को जैसे ही स्टार्ट करने का प्रयास किया तो वैन स्टार्ट नहीं हुई। चालक के चेहरे पर पसीना था क्योंकि अधिकारी जल्दी से जल्दी वैन को मुरादाबाद ले जाने के लिए जोर दे रहे थे। वैन का सेल्फ दम तोड़ चुका था। मजबूरन धक्के की दरकरार हुई। अधिकारियों के सामने ही दर्जनभर पुलिस कर्मियों को वैन में धक्का लगाना पड़ा। तब कहीं जाकर वह स्टार्ट हुई। जर्जर कैदी वैन की हालत से आधुनिक युग में लाचार तस्वीर सामने आई। जहां एक ओर अपराधी लगातार आधुनिक होते जा रहे हैं। वहीं दूसरी ओर पुलिस की सेवाएं पुराने ढर्रे पर ही जमी हुई हैं।
सवाल यह उठता है कि मुरादाबाद से चंदौसी की दूरी तकरीबन 55 किलोमीटर की है। कारागार से छोटे और बड़े किस्म के अपराधी पेशी पर आते हैं तो वैन की जर्जर हालत किस हद तक सुरक्षा का दावा करती है। यदि किसी सुनसान स्थान पर वैन खराब हो जाए तो क्या आरोपियों को वैन से उतरवा कर धक्का लगवाया जाएगा? या वैन में सवार आधा दर्जन या उससे भी कम संख्या के पुलिस कर्मी धक्का मार लेंगे? सवाल कई हैं जिससे पुलिस की सेवाओं की पोल खुल जाती है।
क्या थी पूरी पुलिस?
बंदियों की वैन में जितने सिपाही ड्यूटी पर होने चाहिए थे? क्या उतने सिपाही थे? यह सवाल अब पुलिस की जांच का विषय है। कहा यह जा रहा है कि जितने सिपाहियों की तैनाती बंदियों की वैन के लिए की गई थी। वे सब नहीं थे। हकीकत क्या है। इसकी जांच होगी।
बता दें कि चंदौसी से करीब दो किमी निकलते ही बंदियों ने पीछे के दरवाजे के पास बैठे सिपाहियों की आंखों में मिर्च झोंकने के बाद उन्हें चलती वैन में ही तमंचों से गोली मार दी। इसके बाद वैन के दरवाजे की ग्रिल फैलाकर बाहर निकले और एक सिपाही की रायफल लूटकर फरार हो गए।