मुरादाबाद। सावन माह के पहले सोमवार को शिवालयों में कोविड प्रोटोकाल के हिसाब से पूजा अर्चना की जाएगी। श्रद्धालुओं को दो गज की दूरी को अपनाकर लाइनों में लगना होगा और फिर अपने आराध्य का जलाभिषेक करना होगा। संक्रमण की वजह से इस बार कांवड़ यात्रा पर रोक है। प्रोटोकाल का पालन करवाने के लिए मंदिर प्रशासनों ने रविवार को तैयारियां कीं। साफ-सफाई के साथ मंदिरों में सजावट की गई।
शहर के प्रमुख मंदिर चौरासी घंटा किसरौल के महंत पंडित विष्णुदत्त शर्मा ने बताया कि सभी श्रद्धालुओं को मास्क पहनना अनिवार्य होगा। सेवादार मंदिर के गेट पर रहेंगे और श्रद्धालुओं को कोविड संक्रमण से बचने के लिए बनाए गए नियमों के प्रति जागरूक करेंगे। ज्यादा भीड़ न हो, इसके लिए एक दरवाजे से श्रद्धालु प्रवेश करेंगे और दूसरे दरवाजे से बाहर निकल जाएंगे।
झारखंडी महादेव मंदिर के महंत पंडित भोलेनाथ योगीराज ने बताया कि श्रद्धालुओं से आह्वान किया जाएगा कि वह मंदिर का घंटा न बजाएं। दो-दो कर मंदिर में प्रवेश करें और भगवान का जलाभिषेक करें। उन्होंने कहा कि सेवादारों के अलावा पुलिसकर्मियों की भी तैनाती है।
29 दिन का होगा सावन, रविवार को होगा समापन
ज्योतिषाचार्य पंडित ऋषिकेश शुक्ल ने बताया कि इस बार सावन माह 29 दिन का है। 25 जुलाई से 22 अगस्त तक सावन रहेगा। शुक्ल पक्ष 14 दिन का होगा। चार सोमवार होंगे, जो 26 जुलाई, दो अगस्त, नौ अगस्त और 16 अगस्त को है। इस वर्ष सावन में 11 अगस्त को हरियाली तीज और 13 अगस्त को नाग पंचमी का त्योहार मनाया जाएगा। 22 अगस्त को पूर्णिमा को रक्षाबंधन का त्योहान मनेगा और सावन का समापन होगा। सावन माह का शुभारंभ रविवार को हुआ है और समापन भी रविवार को होगा। उन्होंने कहा कि शिव का गंगाजल और गाय के दूध से अभिषेक करें। फल, फूल, बिल्वपत्र, धतूरा और अन्य पूजन सामग्री से भगवान शिव का दरबार सजाएं और उनकी महाआरती करें।
पांच हजार वर्ष पुराना है चौरासी घंटा मंदिर
किसरौल स्थित चौरासी घंटा मंदिर शहर के प्राचीन मंदिरों में से एक है। महंत पंडित विष्णुदत्त शर्मा ने बताया कि मंदिर की सेवा उनकी दसवीं पीढ़ी कर रही है। पहले उनके पिता, बाबा और अन्य पूर्वजों ने भोले की सेवा की है। करीब पांच हजार वर्ष पहले मकान बनवाने के लिए जमीन खोद रहे थे, तब शिवलिंग मिली। इसके बाद से पूजन शुरू हो गया। मान्यता है कि जो श्रद्धालु सच्चे मन से मन्नत मांगते हैं, वह जरूर पूरी होती है और इसके बाद श्रद्धालु घंटा चढ़ाते हैं। वर्ष 1911 में नेपाल नरेश ने अष्टधातु का घंटा चढ़ाया था। पूरे सावन माह जलाभिषेक करने और दीपक जलाने के लिए श्रद्धालु आते हैं।