बिलारी (मुरादाबाद)। समाजसेवी एवं विचारक डॉ.राकेश रफीक का निधन हो गया। वह 67 वर्ष के थे। अस्वस्थ होने के कारण उनका दिल्ली के एक अस्पताल में उपचार चल रहा था। सोमवार सुबह वहीं उन्होंने अंतिम सांस ली।
डॉ.राकेश के न रहने की जानकारी मिलते ही बिलारी ही नहीं आसपास के तमाम लोग शोक संवेदना जताने बिलारी में शाहबाद रोड स्थित उनके आवास पर पहुंच गए। अंतिम संस्कार स्थल पर भी श्रद्धांजलि देने वालों की भीड़ जुटी रही। उनकी ही तरह प्रगतिशील विचारधारा की पक्षधर बेटी डॉ.झरना और कैप्टन तराना ने नगर स्थित श्मशान में अपने पिता को मुखाग्नि दी। उनके परिवार में दोनों बेटियों के अलावा पत्नी डॉ. मीनाक्षी सखी हैं।
श्रद्धांजलि देने पहुंचे लोगों के बीच उनके व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओं और समाज हित के आंदोलनों में उनकी सक्रियता की चर्चा होती रही। खासकर जाति तोड़ो-समाज जोड़ो मुहिम में उनके योगदान को याद करते हुए उनके साथियों ने बताया कि उन्होंने स्वयं अंतरजातीय विवाह करके और अपने नाम से जुड़ा जातीय संबोधन हटाकर खुद को राकेश रफीक नाम दिया। इस दौरान जेपी आंदोलन, नर्मदा बचाओ आंदोलन, अन्ना हजारे आंदोलन, छात्र युवा संघर्ष वाहिनी, किसान आंदोलनों में उनकी सक्रियता और उनके द्वारा गठित विभिन्न संगठनों की गतिविधियों को भी याद किया गया। दिल्ली में अध्यापन का अनुभव रखने वाले डॉ. राकेश रफीक ने अलग-अलग विषयों पर कई पुस्तकें लिखीं और नगर में पुस्तकालय भी खुलवाया।
डॉ. राकेश रफीक के निधन की जानकारी पर दिल्ली प्रदेश सरकार के पूर्व मंत्री गोपाल राय, बिलारी के सपा विधायक मोहम्मद फहीम समेत तमाम लोगों ने उनके आवास पर पहुंचकर उन्हें श्रद्धांजलि दी। तहसील बार एसोसिएशन ने शोक सभा कर न्यायिक कार्य स्थगित रखा। इसके अलावा कई सामाजिक, व्यापारिक, राजनीतिक व किसान संगठनों के प्रतिनिधि भी श्रद्धांजलि अर्पित करने वालों में शामिल रहे।