मुरादाबाद। श्री हनुमंत कथा के तीसरे व अंतिम दिन बागेश्वर धाम पीठाधीश्वर पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने कहा कि संतुष्टि ही सुख है और यह हनुमान जी की शरण में मिलती है। जिसे संतोष मिल गया फिर उसे जीवन में थोड़ा और की चाह नहीं रहती। यही सुख का मूल भाव है, ईश्वर की कृपा होने के बाद थोड़ी और माया पाने की चाह रखना ही दुख है।
धीरेंद्र शास्त्री श्री हनुमंत कथा में हनुमान चालीसा की चौपाई सब सुख लहै तुम्हारी सरना, तुम रक्षक काहू को डरना का सार बता रहे थे। उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक जीवन पर मंगल खोज रहे हैं और हम जीवन में मंगल खोज रहे हैं। जीवन में मंगल तब मिलेगा जब हम मंगल भवन की शरण में आ जाएंगे। हनुमान जी की शरण दिलाने का काम कथा का है। आत्मा को परमात्मा से मिलाने का काम कथा का है। धीरेंद्र शास्त्री ने मंगल और अमंगल में पांच अंतर भी बताए।
कहा कि भक्ति न होना, घर में क्लेश होना, माता-पिता व गुरु की अवहेलना करना, वासना, भोग में लिप्त रहकर परमात्मा को भूल जाना, सत्संग, पुराण व कथा का श्रवण बेफिजूल लगना और फिल्मी गीतों को परमानंद मानना ही अमंगल है। जबकि हनुमान जी को नित्य स्मरण करना, रोजाना सुबह अपने गुरु या ब्राह्मण के दर्शन करना, घर में सुख-शांति होना, घर में माता-पिता का खुश रहना, अतिथि का सत्कार होना ही मंगल है।