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इंसाफी तकाजे पूरे होने पर ही सजा सही, पर इंसाफ में देरी से बढ़ जाता है गुस्सा: नवाज देवबंदी

Sun, 08 Dec 2019 06:36 AM IST
दुष्यंत शर्मा अमित मुद्गल, मुरादाबाद
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डॉ. नवाज देवबंदी - फोटो : अमर उजाला
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‘जलते घर को देखने वालों फूस का छप्पर आपका है

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आग के पीछे तेज़ हवा है आगे मुकद्दर आपका है
उस के क़त्ल पे मैं भी चुप था मेरा नंबर अब आया
मेरे क़त्ल पे आप भी चुप हैं अगला नंबर आपका है’
मशहूर शायर डा. नवाज देवबंदी आज आहत हैं। उन्होंने यह शेर चाहे किसी भी परिप्रेक्ष्य में लिखा हो पर बलात्कार की घटनाओं से चाक हुआ उनका दिल आज फिर यही कह रहा है। कहते हैं कि हम नहीं चेते तो संस्कारों को भस्म कर चुकी यह आग किसी को नहीं छोड़ेगी।

हैदराबाद एनकाउंटर पर कहते हैं कि इंसाफ के सारे तकाजे पूरे होने पर ही सजा होनी चाहिए पर इंसाफ में देरी होने से गुस्सा बढ़ जाता है। अमर उजाला कार्यालय में उन्होंने शनिवार को अपने उद्गार कछ यूं व्यक्त किएः-
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जिस तरह का माहौल आज देश में है, बेटियां सुरक्षित नहीं है और घटनाएं बढ़ती जा रही हैं तो इसका क्या सबसे अहम कारण मानते हैं?
जवाब: बदकिस्मती है कि आज हमारी पहचान ऐसे कारनामों से हो रही है। दरअसल हमारी बुनियाद खोखली हो गई है जिसे मजबूत करने की जरूरत है। इसके लिए शिक्षा जरूरी है।  पाठ्यक्रमों में बदलाव जरूरी है।
किस तरह के बदलाव?
जवाब: शिक्षा का मतलब पाठशालाओं से लेकर घर तक हम नई नस्लों को आदर्शवादी बनाएं। संस्कार दें। इस तरह की घटनाओं को अंजाम देने वाला इंसानी नहीं बल्कि हैवानी समाज है। हम इंजीनियर, डॉक्टर तो बना रहे हैं पर आज जरूरी है कि एक बेतरीन संस्कारी बेटा तैयार करें। समझें कि हमारी भी बहू, बेटियां हैं।
इसके लिए पाठ्यक्रमों में किस तरह के बदलाव की जरूरत है?
जवाब: हमने बचपन में ‘हमारे पूर्वज ‘नाम की पुस्तक पढ़ी थी जो कोर्स का हिस्सा थी। हम दधिचि, दशरथ पढ़े।  प्रेमचंद की कहानियां पढ़ीं। नई पीढ़ी इससे दूर हो गई। यह पीढ़ी इंटरनेट पर ऐसी चीजें तलाश रहीं है जो उसे भटका रही है। फिर से उसी तरह का पाठ्यक्रम लाना होगा।
हैदराबाद एनकाउंटर पर क्या कहना चाहेंगे?
जवाब: इंसाफ के सारे तकाजे पूरे होने पर ही सजा होनी चाहिए। हो सकता है कि इस मामले में यह बात न लागू होती हो पर यह बात तो बिल्कुल सच है कि इंसाफ में देरी होने से गुस्सा बढ़ जाता है।
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एक शब्द में इस बीमारी का क्या उपचार है?
जवाब: साहित्य
कैसे
जवाब: भारत कृषि प्रधान देश है। होना भी चाहिए पर भारत को साहित्य प्रधान बनाने की मुहिम फिर शुरू होनी चाहिए। नई पीढ़ी साहित्य की ओर लौटेगी तो यह तय है कि वह संवेदनशील बनेगी, संवेदनहीन नहीं। जिसमें  संवेदना नहीं, वह पत्थर है। और संवेदनशील युवा कोई भी घृणित कृत्य नहीं कर  सकता।

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