देश के पहले राष्ट्रपति डा. राजेंद्र प्रसाद और प्रधान मंत्री पंडित जवाहर लाल नेेहरू के हाथों वीरता पुरूस्कार(गैलन्ट्री अवॉर्ड) पाने वाले एयरफोर्स के रिटायर्ड अफसर नवल किशोर मल्होत्रा(93) ने तन्हाई और अकेलेपल को ही अपना आशियाना बना लिया है। चकबंदी विभाग से सीओ पद से सेवानिवृत्त बेटे अशोक मल्होत्रा और बहू नीलम ने उन्हें अकेला छोड़ दिया। वह दीय दयाल नगर में किराये के एक मकान में समय बीते को मजबूर हैं। जिनके लिए जीवन भर किया आज उन्हीं अपनों तन्हां कर दिया। अपनी वीरता की कहानी सुनाते हुए जहां 93 वर्षीय एनके मल्होत्रा बेड से उठने लगे तो वहीं बेटे और बहू का नाम लेते ही उनका मुरझा गया। हाथ उठा कर बोले बस रहने दीजिए।
नवल किशोर मल्होत्रा का जन्म 11 अक्टुबर 1923 में लखनऊ के काकौरी में हुआ था। उनके पिता अग्रेजी शासन में तहसीलदार थे। तामिल नायडू विश्व विद्यालय से अंग्रेजी में एमए पास करने के बाद नवल किशोर मल्होत्रा 1943 में एयर फोर्स में भर्ती हो गए थे। इनके परिवार में पत्नी सुशीला मल्होत्रा और बेटा अशोक मल्होत्रा व बेटी किरण मल्होत्रा थी। नवल किशोर को किताबें लिखने और रिसर्च करने का जूनुन था। 1928 में वह सेवा निवृत्त हे गए। लेकिन तब बेटा चकबंदी विभाग में सीओ और बेटी नीलम डाक्टर चुकी थी। इनका जीवन ठीक चल रहा था। लेकिन बूढ़ापा बढ़ने के बाद ही घर में कलह शुरू हो गई।
इसके बाद अशोक ने पिता को दीन दयाल नगर में राकेश यादव के मकान में फर्स्ट फ्लोर एक कमरा किराये पर लेकर दे दिया। जबकि दीन दयाल नगर में ही उनके बेटे और बहू अपने आवास में रहते हैं। करीब दो साल से नवल किशोर इसी कमरे में अपने अंतिम दिन गिन रहे हैं। नवल किशोर ने बताया कि बेटे की पत्नी उन्हें अपने साथ रखने को तैयार नहीं है। बेटा तो मुझे ले जाना चाहता है। लेकिन बहू नहीं चाही। अब तो बस मैंने इस अंधेरे को अपना साथी बना लिया है।
कागजों में सिमटकर रह गए संस्कार
मुरादाबाद। नवल किशोर ने बताया कि वह अपने शुरुआती दिनों में दूसरे घरों को देखकर सोचते थे कि लोग अपनों से ही कितनी नफरत करते हैं। उन्हें दर दर भटकने को छोड़ देते हैं। तब उन्होंने युवा पीढ़ी के लिए एक संस्कार किताब लिखी थी। जिसमें वह सब कुछ लिखा जो एक मानव को करना चाहिए। घर में संस्कार होने चाहिए। बड़ों और गुरुजनों को उनकी जगह मिलनी चहिए। कागजों पर संस्कार लिखने के चक्कर में अपने घर में ही संस्कार देना शायद भूल गया।
गांधी नगर के आवास को बेचकर चले गए थे दिल्ली
मुरादाबाद। नवल किशोर ने बताया कि गांधी नगर में 600 वर्ग मीटर में उनका आवास था। लेकिन बेटे की पत्नी उनसे झगड़ा करती थी तो वह उसे बेचकर दिल्ली के अवंतिका कालोनी में बस गए थे। मगर बेटे की जिद पर वह वापस लौट आए थे।
यूपी में रिसर्च सेंटर खुलवाने की मांग
मुरादाबाद। कई बार उन्होंने देश के प्रधान मंत्री, प्रदेश के मुख्य मंत्री को पत्र लेकर यूपी में भी रिसर्च सेंटर खुलवाने की मांग कर चुके हैं। उन्होंने बताया कि उन्होंने जीवन पर रिसर्च किया है। उन्होंने जीवन की उत्पत्ति नाम से एक किताब लिखी है।
कौन चाहता है अपने पिता को दूर रखना। दूसरों की तरह मेरी भी अपनी परेशनियां हैं। सुबह शाम मैं पिता की देख भाल के लिए ज्याता हूं। पिता बूढ़े हो गए तो उनमें चिचचिला पन आ गई है। मेरी पत्नी और उनके बीच कहासुनी देती है। इस लिए ही घर के झगड़े शांत करने के लिए उन्हें वहां रखा गया है।
अशोक मल्होत्रा, रिटायर्ड चदबंदी सीओ
पाकिस्तान में बम दागने पर मिला था सम्मान
मुरादाबाद। नवल किशोर एयर फोर्स में वारंट आफिसर के पद तैनात थे। उन्होंने बताया कि 1947 में उन्होंने पाकिस्तान में बम दागे थे। तब उनका नाम वीरता पुरूस्कार के लिए चुना गया था। इसके अलावा कश्मीर में पहुंचकर देश के पहले प्रधानमंत्री पं जवाहर लाल नेहरू ने उनकी पीठ थपथपाई थी।
इस उम्र में आंखों की रोशनी बरकरार
मुरादाबाद। भले ही अपनों से उनसे दूसरी बना ली। लेकिन कुदरत ने उनकी आंखों की रोशनी को बरकरार रखा है। वह अब भी बना चश्मे से फर्राटेदार अंग्रेजी पढ़ते हैं।
इसी मकान में मिली थी सिपाही की लाश
मुरादाबाद। जिस मकान में नवल किशोर रहते हैं। उस मकान के दूसरे ही कमरे में सिपाही की लाश मिली थी। चार दिन से नवल किशोर लाश की बदबू महसूस कर रहे थे। लाश को सोमवार को निकाल ली गई थी। लेकिन जांच पड़ताल के चक्कर में अभी कमरे को साफ नहीं किया गया है।