मुरादाबाद। यूक्रेन में फंसे शहर से सटे ग्राम गोंधी निवासी इमरान तीस घंटे के लंबे सफर के बाद रविवार सायं करीब चार बजे अपने घर पहुंच गया। लेकिन उसके दिलो दिमाग पर अभी यूक्रेन पर हमले की दहशत, वहां के लोगों का दर्द हावी है। यही वजह है कि उसे बयां करते हुए कई बार उसकी जुबा लड़खड़ा जाती है और रोंगटे खड़े हो जाते हैं। ऐसा हो भी क्यो नहीं बीते तीन-चार दिनों से न कुछ खाना अच्छा लग रहा था और न ही पीना। घर के लोगों से मुलाकात के बाद उसने कुछ राहत जरूर महसूस की है, लेकिन इसके बाद भी यूक्रेन का मंजर बार-बार उसे याद आता रहता है।
गांव गोंधी में खेती किसानी करने वाले हाजी भूरे अली के तीन पुत्रों में सबसे छोटा इमरान भी देश के तमाम युवाओं की तरह यूक्रेन में उज्जारॉर्ड यूनिवर्सिटी से एमबीबीएस कर रहा है। इमरान ने बताया कि शुक्रवार को भारतीय दूतावास के माध्यम से बताया गया कि शनिवार सुबह दस बजे हॉस्टल से बस में सवार होकर हंग्री की राजधानी बूडापेस्ट रवाना होना है। इसके लिए 50 डालर जमा कराए गए। सुनकर खुशी हुई, लेकिन रात आंख में कटी। शनिवार सुबह छह बजे ही जगा दिया गया। - 6 डिग्री तापमान था, लेकिन घर जाने की खुशी के जोश को वह ठंडा नहीं कर सका। दस बजे शाम करीब चार बजे 240 साथियों के साथ बूडापेस्ट पहुंच गए। वहां सबकी चेकिंग हुई। रात 12:30 बजे हंग्री एयरपोर्ट से एयर इंडिया की फ्लाइट से सुबह रविवार सुबर करीब नौ बजे एयरपोर्ट दिल्ली पहुंच गए। पहले एयरपोर्ट पर स्वागत किया गया। इसके बाद हम सभी लोगों को यूपी भवन ले जाया गया। वहां नाश्ता और खाना खिलाने के बाद भारत सरकार ने अपने साधन से मुझे अपने घर गोंधी भेजा। चार बजे मैं अपने परिवार वालों के पास आ गया। फ्लाइट, टैक्सी सबका खर्चा भारत सरकार ने ही वहन किया।
14 फरवरी से ही पता लग गए थे हालात बिगड़ने के आसार
इमरान ने बताया हालात बिगड़ने के आसार तो कि 14 फरवरी से ही शुरू हो गए थे। जिसकी वजह से 15 फरवरी से ही ऑफ लाइन मोड की पढ़ाई को ऑनलाइन कर दिया गया था। यूनिवर्सिटी ने उसी दिन एक फार्म भरवाया। जिसमें यह लिखा था कि यहां हम रुकेंगे तो अपने रिस्क पर। इसके बाद से ही डर लगने लगा था। बाहर नहीं घूमने नहीं जाते थे। बृहस्पतिवार और शुक्रवार को यूक्रेन के कई प्रमुख सैन्य ठिकानों व उसके आसपास के शहरों पर रूस के हमले के बाद मैं और सभी साथी काफी डर गए थे। घर पर बात करने पर कुछ देर थोड़ी राहत मिलती थी, लेकिन फोन कटने के बाद फिर भय सताने लगता था। हालांकि मेरी यूनिवर्सिटी स्लोवाकिया की सीमा से सटी थी, लिहाजा वहां कोई चिंता की बात नहीं थी, लेकिन भय सताता रहता था। पिछले कई दिनों से कमरे से बाहर जाने की इजाजत नहीं थी। रात में धमाकों व जेट विमानों की उड़ानों की आवाजें सुनाई देती थी। रात में सुरक्षा के लिहाजा से बजने वाले गाड़ियों के बजने वाले सायरनों से डर कम होने के बजाय और बढ़ जाता था। दिल में आता था कि कोई खतरा तो नहीं।
मां-पिता के छलके खुशी के आंसू
इमरान जब घर पहुंचा तो सभी उसकी प्रतीक्षा कर रहे थे। पिता भूरे, मां राशिदा बेगम की खुशी का ठिकाना नहीं था। इमरान को सही सलामत वापस देख उनकी आंखों में खुशी के आंसू आ गए। इमरान से चिपट कर दोनों काफी देर तक रोए।