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सबका मिला संग तो कोरोना संक्रमित मौत से जीत रहे जंग

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मुरादाबाद। कोरोना संक्रमण का फैलाव सिकुड़ने के साथ मृत्यु दर सितंबर की तुलना में आधे से कम आ गई है। अक्तूबर के आठ दिनों में तीन गंभीर मरीजों ने जिंदगी की जंग हारी है। जबकि सितंबर में औसतन प्रतिदिन एक संक्रमित की मौत हो रही थी। नोडल अधिकारी की समीक्षा में कोविड और नॉन कोविड अस्पतालों और रैपिड रिस्पांस टीमों की जवाबदेही सुनिश्चित होने के बाद मृत्यु दर में कमी आई है।
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मुरादाबाद में अब तक 151 लोग कोरोना संक्रमण की चपेट में आने से दम तोड़ चुके हैं। इनमें अधिकतर 50 साल से अधिक और पहले से किसी ने किसी बीमारी से पीड़ित रहे हैं। हालांकि, मृतकों में कई ऐसे लोग भी हैं जिनकी उम्र 30 से 40 साल के बीच रही है। उनको कोई बीमारी नहीं थी। कोविड की जांच और निजी अस्पतालों से कोविड अस्पताल रेफर करने में हुई देरी से उनकी जान नहीं बचाई जा सकी। मृत्यु दर में कमी लाने के लिए सरकार के लगातार प्रयास के बाद सितंबर माह में नोडल अधिकारी ने सर्किट हाउस में बैठक ली। कोविड की समीक्षा में नॉन कोविड अस्पतालों और रैपिड रिस्पांस टीम (आरआरपी) की लापरवाही सामने आई। आरोप लगे कि निजी अस्पताल आशंकित की कोविड जांच करवाने में देरी करते हैं। मरीज को भर्ती कर कोविड के बजाय दूसरी जांचें करवाते हैं, जिससे उनका मीटर चलते रहता है। इस अंतराल में कोविड जांच रिपोर्ट पॉजिटिव आने तक मरीज का ऑक्सीजन लेवल गिरकर 60-70 तक पहुंच जाता है। कोविड अस्पताल रेफर होने पर वेंटिलेटर पर भी रिकवरी नहीं कर पाता है। आरआरपी टीमों द्वारा भी होम आइसोलेट मरीजों की निगरानी में लापरवाही सामने आई थी।
नोडल अधिकारी की समीक्षा के बाद कोविड और नॉन कोविड अस्पतालों के साथ आरआरपी टीमों की जवाबदेही तय कर दी गई। स्वास्थ्य विभाग ने अस्पतालों के लिए प्रारूप तय किया गया। जिसमें मरीज के अस्पताल पहुंचने पर ऑक्सीजन स्तर, लक्षण, कोविड सैंपल कब लिया और रिपोर्ट पॉजिटिव आने के बाद कितनी देर में रेफर किया, उल्लेख करना अनिवार्य कर दिया। यदि मरीज की मौत होती है तो उसकी वजह भी स्पष्ट लिखने के साथ हर मौत के आडिट के निर्देश जारी किए। इसमें लापरवाही सामने आने पर अस्पताल के खिलाफ कार्रवाई की चेतावनी दी गई। इसी तरह आरआरपी टीमों को होम आइसोलेट मरीजों की निगरानी करने और ऑक्सीजन स्तर में गिरावट आने पर अस्पताल रेफर करने के निर्देश दिए। परिवार के लोगों पर भी जानकारी छिपाने पर महामारी एक्ट में कार्रवाई करने की चेतावनी दी गई।
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सीएमओ डा. एमसी गर्ग के मुताबिक निजी अस्पताल पहले लापरवाही बरत रहे थे। इससे मरीजों की हालत बिगड़ने पर जान बचाना भारी पड़ रहा था। सितंबर में जिले में करीब 33 लोगों की मौत हुई। अगस्त में संख्या इससे अधिक थी। लेकिन अक्तूबर के आठ दिनों में मरीजों को मौत के मुंह तक जाने से बचा लिया। तीन लोगों की जान गई है। डा. गर्ग बताते हैं, मरीज को समय पर इलाज सुविधा देना सबका दायित्व है। इसमें परिवार के लोग भी शामिल हैं। उनकी जागरूकता से मरीज समय पर अस्पताल पहुंच पाता है।
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