मरीजों को कपड़ों के लिए एनजीओ करते हैं मदद
शहर के कुछ एनजीओ ऐसे मरीजों के लिए मदद का हाथ बढ़ा रहे हैं। वर्क और परिवर्तन दी चेंज नामक दो एनजीओ इन मरीजों के लिए कपड़ों की व्यवस्था करते हैं। कुछ इन्हें खाना भी उपलब्ध कराते हैं। हालांकि खाने की व्यवस्था अस्पताल की ओर से भी रहती है। इन मरीजों को नहलाने से लेकर साफ-सफाई करने तक अलग ही स्टाफ तैनात है।
इमरजेंसी वार्ड में इसी तरह 11 साल का हिमांशु भर्ती है। उसकी आंखों में उमड़ते दर्द के समंदर को पढ़ना बड़ा आसान है। जरा कुरेदिए तो पता चलता है कि बिना मां-बाप के बच्चा पांच साल से सड़कों पर भटक रहा है। अस्पताल उसके रिश्तेदारों की तलाश में जुटा है।
तीन साल में 10 से ज्यादा मरीजों को अपनों से मिलवाया
जिला अस्पताल के स्टाफ ने इस तरह तीन साल में 10 से ज्यादा मरीजों के परिजनों को उनसे मिलवाया है। पहले यह तलाश फेसबुक व व्हाट्सएप पर चलती थी। अब इसे यूट्यूब चैनल का रूप दिया गया है। दिल्ली निवासी सिक्योरिटी गार्ड राजू अस्पताल प्रबंधक को फोन कर आज तक शुक्रिया कहते हैं। चार माह पहले ट्रेन में जहरखुरानी का शिकार होने के बाद वह अपना नाम व पता तक नहीं बता पा रहे थे। फेसबुक के जरिए उनके परिवार को पता चला तो पत्नी व बच्चे दिल्ली से दौड़े चले आए।
मैं जानता हूं कि अपनों को खोने और इनसे अलग रहने का दर्द क्या होता है। सोशल मीडिया के जरिए जब कुंदरकी वाले मरीज के परिजन मिले और अस्पताल आकर पैर पकड़ लिए, तब पता चला कि यह कितना नेक काम है। इसलिए अब चैनल बनाया है। - कुलदीप सक्सेना, जिला अस्पताल, प्रबंधक
अस्पताल के स्टाफ ने सराहनीय पहल की है। लोगों के परिजनों को सोशल मीडिया से जानकारी मिलती है तो वह अस्पताल दौड़े चले आते हैं। कुछ मरीज ऐसे भी हैं जिनके अपने उन्हें स्वीकारने को तैयार नहीं। ऐसे मरीजों के लिए समाज कल्याण विभाग की मदद लेंगे। - डॉ. राजेंद्र कुमार, चिकित्साधीक्षक