मत कहो आकाश में कुहरा घना है, यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है....यहां दरख्तों के साये में धूप लगती है....कौन कहता है आसमां में सूराख नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारों...यहां तक आते-आते सूख जाती हैं सभी नदियां, मुझे मालूम है पानी कहां ठहरा हुआ होगा..तुमको निहारता हूं सुबह से ऋतंबरा... से अनमोल शेरों से गजल का नया मुहावरा गढ़ने वाले दुष्यंत कुमार को उनकी पुण्यतिथि पर मुरादाबाद के वरिष्ठ साहित्यकारों ने भावभीनी श्रद्धांजलि दी।
हंदी साहित्य सदन व अक्षरा के तत्वावधान में गजलकार दुष्यंत कुमार की 42 वीं पुण्यतिथि पर रेती स्ट्रीट त्यागी कांपलेक्स स्थित प्राचीन मंदिर में आयोजित स्मृति संध्या में नवगीतकार माहेश्वर तिवारी ने अपनी बात रखते हुए कहा दुष्यंत की गजलों से पहले की रचना यात्रा में उनकी मुक्तछंद की कविताओं ने उन्हें गजलकार बनाने में अहम भूमिका अदा की।
व्यवस्था विरोध में कह गए दुष्यंत के शेर आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं, जितने उस दौर में प्रासंगिक थे। उनके द्वारा आम आदमी की तकलीफ आम आदमी की भाषा में अपने शेर में कही हैं।
मुख्य अतिथि मशहूर शायर मंसूर उस्मानी ने कहा कि दुष्यंत को हिंदी या उर्दू के दायरे में समेटना उनके साथ नाइंसाफी होगी। वह आम आदमी की जुबान और हिंदुस्तानी जुबान के शायर थे। वरिष्ठ शायर डा. कृष्ण कुमार नाज ने कहा कि दुष्यंत के अशआर आम आदमी की पीड़ा के साथ-साथ श्रृंगार को भी बड़ी सुंदरता से चित्रित करते हैं।
डा. अजय ‘अनुपम’ ने कहा कि दुष्यंत कुमार की गजलों की भाषा आम बोलचाल की भाषा थी। वह आम आदमी की उपेक्षा से आहत थे। योेगेंद्र वर्मा ‘व्योम’ ने कहा दुष्यंत कुमार गजल की नई परिभाषा और नया मुहावरा गढ़ने वाले अद्भुत गजलकार थे।
इस मौके पर डा. रामानंद शर्मा, डा. पूनम बंसल, जिया जमीर, डीपी सिंह, केके गुप्ता, डा. माधुरी सिंह, डा. चंद्रभान सिंह यादव, विजय दिव्य, पंडित हरिश्चंद्र शास्त्री, डा. कौशल कुमारी आदि उपस्थित रहे। संचालन वरिष्ठ साहित्यकार डा. अजय अनुपम ने किया।