जुल्म-ए-माजी आइंदा जहन में रहे
एक शिकारी परिंदा जहन में रहे
वोट देने को घर से निकलिएगा जब
तब वो खूनी दरिंदा जहन में रहे
हमने उसके जिस्म को फूलों की वादी कह दिया
इस जरा सी बात पर हमको फसादी कह दिया
हमने अकबर बनकर जोधा से मोहब्बत की
मगर सिरफिरे लोगों ने हमको लव जिहादी कह दिया
हम अम्न चाहते हैं मगर जुल्म के खिलाफ
गर जंग लाजमी है तो फिर जंग ही सही
खुद को सच्चाई का ठेकेदार लिखने लग गए
बौखलाहट में सरे बाजार लिखने लग गए
एक नारे से हुकूमत इस कदर घबरा गई
चोर साहब खुद को चौकीदार लिखने लग गए