मुरादाबाद। तेंदुओं को पकड़ने के लिए वन विभाग का अभियान जितना लंबा खिंच रहा है, उतना ही सरकारी खजाने पर बोझ बढ़ता जा रहा है। तीन अगस्त को लालापुर पीपलसाना में महिला की मौत के बाद शुरू हुए अभियान के 32 दिन में करीब 45 लाख रुपये खर्च हो चुके हैं। छह जिलों के करीब 80 कर्मचारी दिन-रात जंगल और खेतों में निगरानी कर रहे हैं। 12 तेंदुए पकड़े भी जा चुके हैं। 40 गांवों में पिंजरे लगाए गए हैं। करीब 30 ट्रैप कैमरे और थर्मल ड्रोन निगरानी में लगाए गए हैं। इसके बावजूद बहापुर बलिया में तीन लोगों की जान लेने वाले आदमखोर तेंदुए की पहचान अब तक नहीं हो सकी है।
यानी औसतन हर दिन करीब 1.4 लाख रुपये अभियान पर खर्च हो रहे हैं। यह रकम किसी एक चीज पर नहीं, बल्कि पूरे रेस्क्यू ऑपरेशन पर खर्च हो रही है। पिंजरों की खरीद और स्थापना, ट्रैप कैमरे, थर्मल ड्रोन, वाहनों की आवाजाही और ईंधन, कर्मचारियों की लगातार गश्त, निगरानी उपकरण, रेस्क्यू टीमों की तैनाती और पिंजरों में बांधे जाने वाले चारे पर खर्च हो रही है। पिंजरों में तेंदुओं को आकर्षित करने के लिए मुर्गे और बकरियां बांधी जा रही हैं। इनकी नियमित व्यवस्था भी अभियान के खर्च का हिस्सा है। तेंदुआ पकड़ में आने के बाद उसे सुरक्षित स्थान तक पहुंचाने के लिए रेस्क्यू टीम और वाहन भी लगाए जाते हैं। तेंदुओं को पकड़ने के लिए अलग-अलग गांवों में पिंजरे लगाए गए हैं। विभाग ने शासन से 50 पिंजरों की मांग की थी। एक पिंजरे की कीमत करीब 1.20 लाख रुपये बताई गई है। यानी 50 पिंजरों की कीमत ही करीब 60 लाख रुपये बैठती है, जोकि अब तक के खर्च से अलग है।
गश्त से लेकर चारे तक 15 लाख
अभियान में सबसे बड़ा खर्च लगातार चल रही टीमों की गश्त और फील्ड ऑपरेशन पर हो रहा है। छह जिलों से आईं टीमों को प्रभावित गांवों में दिन-रात तैनात रखा गया है। टीमों की आवाजाही के लिए वाहन और ईंधन, निगरानी के दौरान इस्तेमाल होने वाले सहायक उपकरण, रेस्क्यू के जरूरी सामान और कर्मचारियों के खाने-पीने की व्यवस्था पर करीब 15 लाख रुपये खर्च हुए हैं। इनमें तेंदुओं को फंसाने के लिए पिंजरे में बांधे गए मुर्गी और बकरी का खर्च भी शामिल है। सिर्फ तेंदुए के चारे की व्यवस्था में ही डेढ़ लाख से अधिक रुपये खर्च हो चुके हैं।
ड्रोन और पिंजरों पर करीब 20 लाख
तेंदुओं की तलाश में रात के समय थर्मल ड्रोन का इस्तेमाल किया जा रहा है। इससे गन्ने और घनी झाड़ियों वाले इलाकों में छिपे तेंदुओं की गतिविधियों पर नजर रखने में मदद मिलती है। निगरानी व्यवस्था मजबूत करने के लिए रेस्क्यू पिंजरे भी लगाए गए हैं। एक पिंजरा 1.20 लाख रुपये का है। 12.5 लाख रुपये का एक थर्मल ड्रोन है। थर्मल ड्रोन और पिंजरों की खरीद समेत इन संसाधनों पर करीब 20 लाख रुपये खर्च होने की जानकारी है। विभाग ने अभियान के दौरान बड़ी संख्या में पिंजरों की व्यवस्था की है, जिन्हें प्रभावित गांवों और तेंदुओं की गतिविधियों वाले स्थानों पर लगाया जा रहा है।
कैमरे, एनिडर डिवाइस और रेस्क्यू पर 10 लाख
किस तेंदुए की गतिविधि कहां है और कौन सा तेंदुआ बार-बार आबादी के आसपास पहुंच रहा है, यह पता लगाने के लिए करीब 30 ट्रैप कैमरे लगाए गए हैं। इसके अलावा तेंदुओं की गतिविधियों पर नजर रखने और लोगों को सतर्क करने के लिए एनिडर डिवाइस भी लगाए गए हैं। इन उपकरणों और तेंदुओं को पकड़ने के बाद सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाने की व्यवस्था पर करीब 10 लाख रुपये खर्च हुए हैं।
कब-कब हुईं घटनाएं
3 अगस्त - लालपुर पीपलसाना में खेत में चारा काट रहीं संतोष देवी को तेंदुए ने निवाला बनाया।
18 अगस्त - बहापुर बलिया में खेत में काम कर रहीं ब्रह्मो देवी को तेंदुए ने मार डाला।
25 अगस्त - बहापुर बलिया में 19 लोगों के समूह में तेंदुए ने मिथिलेश सैनी को मार डाला।
29 अगस्त - खेत के नजदीक घर में सो रहे दिव्यांग जगराज सिंह सैनी को तेंदुआ उठाकर ले गया और मार डाला
अभी संसाधन पर्याप्त हैं, और बजट की डिमांड की गई है। उसके आने पर और संसाधन बढ़ाए जाएंगे। समस्त स्टाफ कठिन परिस्थितियों में पूरे मनोबल के साथ कार्य कर रहा है। जन सामान्य का सहयोग अपेक्षित है। - आदर्श कुमार, मंडलीय वन संरक्षक