भगवान परशुराम क्षत्रियों के नहीं, अहंकारी राजाओं के शत्रु थे: आचार्य प्रमोद
ब्राह्मण समाज ने बुधवार को भगवान विष्णु के छठे अवतार परशुराम का जन्मोत्सव श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया। अखिल भारतीय ब्राह्मण महासभा के तत्वावधान में आयोजित चार दिवसीय उत्सव के अंतिम दिन वैदिक मंत्रों के साथ भगवान परशुराम की पूजा-अर्चना की गई।
कार्यक्रम में वक्ताओं ने भगवान परशुराम के जीवन से प्रेरणा लेने का आह्वान करते हुए ब्राह्मण समाज से एकजुट रहने की अपील की। मुख्य अतिथि कल्कि पीठाधीश्वर आचार्य प्रमोद कृष्णम ने कहा कि समाज में यह भ्रांति फैलाई गई है कि भगवान परशुराम क्षत्रियों के शत्रु थे, जबकि वे केवल अहंकारी और अधर्मी राजाओं के विरोधी थे।
उन्होंने कहा कि ब्रह्म को जानने वाला ही सच्चा ब्राह्मण होता है, केवल शास्त्रों को रटने से काम नहीं चलेगा, उन्हें समझकर पढ़ना चाहिए। आचार्य प्रमोद ने कहा कि भगवान परशुराम साक्षात पूर्ण अवतार और चिरंजीवी हैं। कलियुग के अंत में जब भगवान कल्कि का अवतार होगा, तब परशुराम उनके गुरु बनकर उन्हें शिक्षा और दीक्षा देंगे।
उन्होंने कहा कि ब्राह्मण समाज का राष्ट्र के प्रति समर्पण ऐतिहासिक रहा है और यह परंपरा आज भी जारी रहनी चाहिए। उन्होंने जातिवाद को नकारते हुए कहा कि मनुस्मृति में जातिवाद का कोई प्रमाण नहीं है, इसलिए समाज को केवल हिंदू बनकर राष्ट्र के लिए कार्य करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में एकता ही सबसे बड़ी शक्ति है। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि भेड़-बकरियों का समाज कभी राष्ट्र निर्माता नहीं बन सकता। गोष्ठी में बनारस से आए डॉ. महिम तिवारी, महामंडलेश्वर हरिमोहन दास, कार्यक्रम अध्यक्ष व भाजपा के क्षेत्रीय महामंत्री हरिओम शर्मा, ब्राह्मण महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष कवि माधव मिश्र ने भी अपनी बात रखी।
राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष महेश चंद्र शर्मा और मंडलाध्यक्ष संजीव सारस्वत ने भी ब्राह्मण समाज को संगठित रहने का संदेश दिया। कार्यक्रम का संचालन महासभा के क्षेत्रीय जिलाध्यक्ष आचार्य भावेश शर्मा ने किया।