जाति, कुल और परंपरा से बड़ी कोई फिल्म नहीं। पद्मावती फिल्म देखने के बाद यदि विवादित तथ्य लगे तो विरोध करूंगा। फिल्म निर्माता संजय लीला भंसाली को क्षत्रिय समाज के प्रबुद्ध व्यक्तियों को फिल्म दिखानी चाहिए थी।
फिल्म बिना देखे आग में घी डालने का काम नहीं करूंगा। यदि राजपूतों की आन-बान-शान के विरुद्ध फिल्म में कुछ नहीं है और अलाउद्दीन खिलजी जिस तरह का क्रूर आतातायी बादशाह था अगर उसका चित्र वैसा है तो विवाद का प्रश्न ही नहीं है। विरोध तो आमिर खान की फिल्म पीके का भी हुआ था। यह कहना है राज्यसभा सांसद अमर सिंह का।
शाहजहांपुर जाते समय वह कुछ देर के लिए दिल्ली रोड स्थित होटल में रुके थे। उन्होंने कहा कि राजपूत समाज अपने आदर्श के प्रति, महाराणा प्रताप के प्रति, पद्मावती के प्रति संवेदनशील है।
कविता की चार लाइनें सुनाते हुए उन्होंने कहा कि ये है अपना राजपुताना नाज जिसे तलवारों पर, ये प्रताप का वतन पला है बरछी तीर कमानों पर, यहां लगा दी बहनों ने भी बाजी अपनी जान की, इस मिट्टी से तिलक करो ये मिट्टी है बलिदान की। अयोध्या में राम मंदिर के मुद्दे पर बोले, यह विषय भी क्षत्रिय समाज से जुड़ा है।
अयोध्या में राम मंदिर बनना चाहिए। अब तो केंद्र और प्रदेश राम भक्तों की सरकारें हैं। राज्य सभा में भी बहुमत की ओर हैं। सहमति से, न्यायालय से अथवा कानून बनाकर राम मंदिर बनना चाहिए। उन्होंने समाजवादी पार्टी पर भी निशाना साधा। कहा, आज के समाजवादियों ने राम मनोहर लोहिया को जाना ही नहीं।
लोहिया राम के भक्त थे। रामायण मेला लगाते थे। राजगद्दी मिल रही हो तो आज के समाजवादी कहते हैं, रामचंद्र कह गए सिया से ऐसा कलियुग आएगा, बेटा करेगा राज, बूढ़ा बाप जंगल को जाएगा।