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Moradabad News: हुई मुद्दत कि गालिब मर गया पर... यहां अब किसको याद आता है

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मुरादाबाद। हुई मुद्दत कि गालिब मर गया पर याद आता है। वो हर इक बात पर कहना कि यूं होता तो क्या होता। मिर्जा गालिब... शायरी का वह नाम जिसे ऐसे लोग भी जानते हैं, जिनका शायरी से कोई रिश्ता नहीं है। ऐसे तमाम शेर हैं जो आम बातचीत में लोगों के मुंह से निकल पड़ते हैं। उन्हें पता भी नहीं होता कि इसे किसने रचा है।
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शहर-ए-जिगर की सरजमीं पर मिर्जा गालिब के कदम चार बार पड़े। एक बार 1860 और दूसरी बार 1865 में। उनके कई शागिर्द और दोस्त भी यहां रहे लेकिन अफसोस... इस शहर में गालिब के नाम का एक पत्थर तक नहीं है। स्मार्ट सिटी के तहत शहर में साहित्य पथ जरूर बना है, जिसमें एक बड़ी स्क्रीन पर जिगर, दुष्यंत सरीखे स्थानीय रचनाकारों के कलाम होंगे।
गालिब के गुजरने के 156 साल बाद भी शहर में उनके चाहने वाले हैं। उनकी चाहत है कि गालिब के नाम से भी शहर में कुछ होना चाहिए। कम से कम उनके लिखे खतों में मुरादाबाद व रामपुर की यात्रा को ही दर्शाया जाए। उर्दू साहित्य शोध केंद्र के संस्थापक डॉ. मोहम्मद आसिफ हुसैन कहते हैं कि मरदान अली खान राना को लिखे खतों में गालिब ने मुरादाबाद व रामपुर की यात्रा का जिक्र किया है। गालिब के इन खतों समेत उनके शागिर्दों की तमाम किताबें उर्दू साहित्य शोध केंद्र में हैं।
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रामगंगा नदी पार करते समय टूट गया था पुल
गालिब के खुतूत (भाग-3) पुस्तक में उनके लिखे खतों का विवरण हैं। इनके मुताबिक गालिब पहली बार 1860 में दिल्ली से रामपुर जाते हुए 25-26 जनवरी को मुरादाबाद में रुके। दूसरी बार रामपुर से वापसी में मुरादाबाद आए। यहां सर सैयद के घर रुके थे। तीसरी बार सात अक्तूबर 1865 को दिल्ली से मुरादाबाद आए। यहां पांच दिन ठहरने के बाद 12 अक्तूबर 1865 को रामपुर पहुंचे। वहां करीब ढाई माह रहे और 28 दिसंबर 1865 को दिल्ली के लिए पालकी में बैठकर रवाना हुए।
गालिब ने खत में लिखा कि उनकी पालकी के रामगंगा का पुल पार करते ही पुल टूट गया। उनके साथी और सामान पीछे रह गए। उस समय गालिब की उम्र 70 साल थी। ठंड के कारण वह बीमार हो गए। यहां किसी को खबर हुई तो वह गालिब को मुरादाबाद की सराय पुख्ता में ले गए। वहां उन्होंने शेर पढ़ते-पढ़ते रात गुजारी। यह खत गालिब ने (नवाब रामपुर) कल्बे अली खान को लिखा था।


मुरादाबाद में गालिब के शागिर्दों की लंबी है फेहरिस्त
1860 में मुरादाबाद यात्रा के दौरान गालिब अपने दोस्त और मुंसिफ नवाब सईदुद्दीन खां के यहां भटयारी की सराय में रुके थे। मिर्जा गालिब के पहचान वालों में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की नींव रखने वाले सर सैयद अहमद के अलावा सईदुद्दीन खां, मोहम्मद हसन खां, मौलवी सैयद अब्दुल रसीद, तमकीन मुरादाबादी जैसे तत्कालीन प्रभावशाली लोग रहे। शार्गिदों में मरदान अली खां, लक्ष्मी नारायण मफ्तू, रिजवान मुरादाबादी, तमन्ना मुरादाबादी, जमशेद अली जम और अलील मुरादाबादी जैसे लोग रहे। गालिब के शागिर्दों के भी कई दीवानों ने शायरी की दुनिया में शोहरत पाई।
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