अपने-अपने पिता के साथ शिल्पी अग्रवाल और प्रिया
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बात चाहे देश और समाज की सुरक्षा की हो या पढ़ाई और खेल के मैदान की, यह साबित होता है कि बेटियां बेटों से कमतर नहीं है। कहीं-कहीं बेटों से बेहतर बेटियों के मजबूत उदाहरण सामने आते हैं। ऐसे मजबूत उदाहरणों की श्रृंखला में शामिल हैं रामपुर की दो बेटियां, जिनमें से एक ने किडनी देकर तो दूसरी ने लिवर का हिस्सा डोनेट कर पिता की जान बचाई। डॉटर्स-डे पर इन अनूठी बेटियों और उनके पिताओं ने अपने अनुभव अमर उजाला से साझा किए।
शिल्पी अग्रवाल ने दी पिता को किडनी
रामपुर के सिविल लाइंस थाना क्षेत्र की कैलाश कॉलोनी निवासी आयकर अधिवक्ता अशोक अग्रवाल को साल 2008 में किडनी की समस्या हुई थी। परिजन उपचार के लिए पहले बरेली और बाद में गुरुग्राम मेदांता अस्पताल ले गए। साल 2012 में चिकित्सकों ने अशोक अग्रवाल को किडनी ट्रांसप्लांट कराने के लिए कहा।
स्पष्ट किया कि जीवन बचाने का यही आखिरी विकल्प है। परिवार के सदस्यों में से किसी की उम्र तो किसी की स्वास्थ्य संबंधी समस्या ने किडनी डोनेशन का रास्ता बंद कर दिया। ऐसे में बेटी शिल्पी अग्रवाल ने डोनर बनने का निर्णय लिया। नवंबर 2012 में शिल्पी ने अपनी एक किडनी देकर पिता को नया जीवन दिया।
शिल्पी आज पूर्ण रूप से स्वस्थ हैं और एक निजी स्कूल में बतौर शिक्षिका कार्य कर रही हैं। पिता अशोक अग्रवाल ने कहा कि उन्हें गर्व है कि ईश्वर ने उन्हें ऐसी बेटी दी, कामना है कि सभी अभिभावकों को ऐसी संतान मिले। मेरी बेटी ने साबित किया कि बेटियां बेटों से कम नहीं हैं।