सरकारी अस्पतालों का भगवान ही मालिक है। सरकार की लचर व्यवस्था से अस्पतालों में दवाओं का संकट खड़ा हो गया है। अस्पतालों के पास दवा खरीद के लिए पर्याप्त बजट है, लेकिन दवाएं नहीं खरीद पा रहे हैं। इसकी मार मरीजों को झेलनी पड़ रही है।
सरकारी अस्पतालों में दवाओं की खरीद के लिए 24 कंपनियों से अनुबंध है। अस्पताल आनलाइन पोर्टल से दवाओं के आर्डर बुक कराते हैं। जिला अस्पताल के चीफ फार्मेसिस्ट डा. संदीप बडोला के मुताबिक कंपनियों की मनमानी और सरकार की लचर व्यवस्था की मार मरीजों को झेलनी पड़ रही है। पोर्टल पर कंपनियों की सात सौ तरह की दवाओं की सप्लाई करने का अनुबंध है। कंपनियों ने अनुबंध के हिसाब से दवाएं पोर्टल पर नहीं दर्शायी। पोर्टल पर 400 से अधिक तरह की दवाएं उपलब्ध होने से अस्पताल जरूरत के हिसाब से आर्डर कर लेते थे। इससे अस्पतालों का काम चल रहा था। डा. बडोला के मुताबिक अक्तूबर माह में पोर्टल से दवाएं गायब हो गई हैं। मात्र 50 तरह की दवाएं हैं। पेरासिटामोल और एंटीबायोटिक जैसी दवाएं नहीं मिल रही हैं।
जिला अस्पताल के पास दवाओं की खरीद का 90 लाख का बजट है। इसके बाद भी अस्पताल मरीजों की जरूरत की दवाएं नहीं खरीद पा रहा है। मौसमी बदलाव से बुखार, खुजली और एंटीबायोटिक की सबसे अधिक जरूरत है। दवाओं का संकट होने से कई मरीज वापस लौट रहे हैं। अस्पताल प्रशासन ने ओपीडी के मरीजों की दवाओं में कटौती की। पहले पांच दिन की दवाएं दी जाती थी, लेकिन अब तीन दिन की दवाएं भी नहीं मिल रही हैं। मरीज प्रधानमंत्री जन औषधि केंद्र पर निर्भर हैं। वहां भी जरूरत और अनुबंध के हिसाब से दवाएं नहीं हैं।