चारों ओर बिखरा कबाड़। उसमें भारी धातु ढूंढते बच्चे, बुजुर्ग। पीतल गलाने की धधकती भट्ठियां और उसमें से निकलता धुएं का गुबार। कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिलता है नवाबपुरा, लालबाग आदि क्षेत्रों में। इस कार्य में लगे लोगों का कहना है कि बच्चों के मुरझाए चेहरे उनके खुद के शरीर के झुलसने पर भारी पड़ जाते हैं।
सिर में दर्द, सीने में जलन और झुलसता हुआ शरीर हर रोज झेलते हैं, पर दो वक्त की रोटियों की चिंता इस सब पर भारी है। नैम्प और आईसीएमआर (इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च) की टीम ने इन लोगों के रक्त के नमूने लिए, जिसमें छह से सात गुना अधिक भारी धातु के कण पाए गए थे।
शहर के लालबाग, नवाबपुरा, बंगला गांव, पीतल नगरी आदि क्षेत्रों में पीतल गलाने के अलावा कबाड़े में से धातु ढूंढने का कार्य किया जाता है। इसके कारण यहां पर सांस, हृदय, आंख और त्वचा संबंधी रोगों की भरमार है। समन्वयक डॉ. अनामिका त्रिपाठी ने कहा कि प्रदूषित हवा से अस्थमा, ब्रोंकाइटिस, कैंसर, रक्तचाप, माइग्रेन, त्वचा बीमारी, आंखों में जलन आदि की समस्या हो रही है।
इसके अलावा रक्त में भारी धातु के कण मिले थे। इसमें मर्करी, कैडमियम, आर्सेनिक, लेड, क्रोमियम, कापर, जिंक आदि मिले थे। मानक है कि यह धातुएं रक्त में होनी ही नहीं चाहिए, जबकि वहां पर सात से आठ गुना हो रही है। इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च की टीम की जांच में भी इन लोगों के रक्त में धातु के कण ज्यादा मिले हैं। इस बाबत शोध एल्सवियर पब्लिकेशन जर्नल में छप चुका है और अब फिर से डा. रंजना चौधरी के निर्देश में इसे प्रकाशित किया जाएगा।
दो सौ रुपये से पांच सौ रुपये है मजदूरी
घर-घर में खुद के कार्य के अलावा ठेके पर भी किया जाता है। स्थानीय लोगों के अलावा बच्चे, बुजुर्ग और आस-पास के ग्रामीण क्षेत्रों से लोग पीतल गलाने और कबाड़े से धातु निकालने का कार्य करने आते हैं। इसके एवज में उन्हें दो सौ रुपये से पांच सौ रुपये की मजदूरी मिलती है।
दूसरे राज्यों से आ रहा कबाड़
इस कार्य में लगे लोगों का कहना है कि कबाड़ दिल्ली, पंजाब, लुधियाना, जलांधर आदि से मंगवाया जाता है। स्थानीय लोग भी वहां जाकर खरीदते हैं। उनका कहना है कि कबाड़े से धातु निकालने का पुश्तैनी कार्य है। इसमें से लोहा, कापर, एल्युमिनियम, लोहा आदि धातु निकाली जाती है। इसके बाद मिट्टी को बाहर ले जाकर फेंक दिया जाता है।
स्वास्थ्य परीक्षण को नहीं लगते शिविर
मजदूरों और स्थानीय लोगों का कहना है कि जब हवा चलती है तो कबाड़े के पीसने के बाद बचा रेत उड़ता है। इससे सिर दर्द, सांस की बीमारी आदि परेशानी होती है। परिवार के पालन-पोषण के लिए यह कार्य कर रहे हैं, लेकिन लोगों के स्वास्थ्य की किसी को चिंता नहीं है। अधिकारियों द्वारा न तो स्वास्थ्य परीक्षण शिविर लगवाए जाते हैं और न ही मास्क आदि का वितरण किया जा रहा है।
कार्ड की नहीं मिल रही सुविधा
गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले इन लोगों का कहना है कि सरकार की ओर से आयुष्मान योजना चलाई जा रही है, लेकिन अभी तक लोगों के आयुष्मान कार्ड भी नहीं बनवाए गए हैं। बहुत से लोगों के तो बीपीएल कार्ड तक की सुविधा नहीं मिल रही है।
तीन घंटे में ढ़ाई सौ किलो गल रही पीतल
पीतल गलाने के लिए इस्तेमाल होने वाली कोयले की भट्टियों की गहराई तीन से करीब चार फीट होती है। इसमें इतनी ज्यादा मात्रा में कोयले का इस्तेमाल किया जाता है कि तीन घंटे में करीब ढ़ाई सौ किग्रा पीतल गलकर तरल पदार्थ के रूप में तब्दील हो जाती है।
पांच मिनट में सिर दर्द की समस्या
पीतल की भट्ठियों के आस-पास एक स्वस्थ व्यक्ति पांच मिनट से ज्यादा समय तक नहीं रुक पाता। इन भट्ठियों से निकलने वाले धुआं की वजह से स्वस्थ व्यक्ति को भी सिर दर्द, सीने में जलन और सांस लेने में परेशानी जैसी समस्याएं होने लगती हैं।