फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

आइये महसूस करें जिंदगी के ताप को, दुखियारों की गलियों में ले चलते हैं आपको

Wed, 06 Nov 2019 06:24 AM IST
दुष्यंत शर्मा नीलम सिंह, मुरादाबाद
विज्ञापन
गर्क होती जिंदगी... - फोटो : अमर उजाला
विज्ञापन

चारों ओर बिखरा कबाड़। उसमें भारी धातु ढूंढते बच्चे, बुजुर्ग। पीतल गलाने की धधकती भट्ठियां और उसमें से निकलता धुएं का गुबार। कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिलता है नवाबपुरा, लालबाग आदि क्षेत्रों में। इस कार्य में लगे लोगों का कहना है कि बच्चों के मुरझाए चेहरे उनके खुद के शरीर के झुलसने पर भारी पड़ जाते हैं। 

विज्ञापन


सिर में दर्द, सीने में जलन और झुलसता हुआ शरीर हर रोज झेलते हैं, पर दो वक्त की रोटियों की चिंता इस सब पर भारी है।  नैम्प और आईसीएमआर (इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च) की टीम ने इन लोगों के रक्त के नमूने लिए, जिसमें छह से सात गुना अधिक भारी धातु के कण पाए गए थे।

शहर के लालबाग, नवाबपुरा, बंगला गांव, पीतल नगरी आदि क्षेत्रों में पीतल गलाने के अलावा कबाड़े में से धातु ढूंढने का कार्य किया जाता है। इसके कारण यहां पर सांस, हृदय, आंख और त्वचा संबंधी रोगों की भरमार है। समन्वयक डॉ. अनामिका त्रिपाठी ने कहा कि प्रदूषित हवा से अस्थमा, ब्रोंकाइटिस, कैंसर, रक्तचाप, माइग्रेन, त्वचा बीमारी, आंखों में जलन आदि की समस्या हो रही है।
विज्ञापन


इसके अलावा रक्त में भारी धातु के कण मिले थे। इसमें मर्करी, कैडमियम, आर्सेनिक, लेड, क्रोमियम, कापर, जिंक आदि मिले थे। मानक है कि यह धातुएं रक्त में होनी ही नहीं चाहिए, जबकि वहां पर सात से आठ गुना हो रही है।  इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च की टीम की जांच में भी इन लोगों के रक्त में धातु के कण ज्यादा मिले हैं। इस बाबत शोध एल्सवियर पब्लिकेशन जर्नल में छप चुका है और अब फिर से डा. रंजना चौधरी के निर्देश में इसे प्रकाशित किया जाएगा।

दो सौ रुपये से पांच सौ रुपये है मजदूरी
घर-घर में खुद के कार्य के अलावा ठेके पर भी किया जाता है। स्थानीय लोगों के अलावा बच्चे, बुजुर्ग और आस-पास के ग्रामीण क्षेत्रों से लोग पीतल गलाने और कबाड़े से धातु निकालने का कार्य करने आते हैं। इसके एवज में उन्हें दो सौ रुपये से पांच सौ रुपये की मजदूरी मिलती है।

दूसरे राज्यों से आ रहा कबाड़
इस कार्य में लगे लोगों का कहना है कि कबाड़ दिल्ली, पंजाब, लुधियाना, जलांधर आदि से मंगवाया जाता है। स्थानीय लोग भी वहां जाकर खरीदते हैं। उनका कहना है कि कबाड़े से धातु निकालने का पुश्तैनी कार्य है। इसमें से लोहा, कापर, एल्युमिनियम, लोहा आदि धातु निकाली जाती है। इसके बाद मिट्टी को बाहर ले जाकर फेंक दिया जाता है।

स्वास्थ्य परीक्षण को नहीं लगते शिविर
मजदूरों और स्थानीय लोगों का कहना है कि जब हवा चलती है तो कबाड़े के पीसने के बाद बचा रेत उड़ता है। इससे सिर दर्द, सांस की बीमारी आदि परेशानी होती है। परिवार के पालन-पोषण के लिए यह कार्य कर रहे हैं, लेकिन लोगों के स्वास्थ्य की किसी को चिंता नहीं है। अधिकारियों द्वारा न तो स्वास्थ्य परीक्षण शिविर लगवाए जाते हैं और न ही मास्क आदि का वितरण किया जा रहा है।

कार्ड की नहीं मिल रही सुविधा
गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले इन लोगों का कहना है कि सरकार की ओर से आयुष्मान योजना चलाई जा रही है, लेकिन अभी तक लोगों के आयुष्मान कार्ड भी नहीं बनवाए गए हैं। बहुत से लोगों के तो बीपीएल कार्ड तक की सुविधा नहीं मिल रही है।
 
तीन घंटे में ढ़ाई सौ किलो गल रही पीतल
पीतल गलाने के लिए इस्तेमाल होने वाली कोयले की भट्टियों की गहराई तीन से करीब चार फीट होती है। इसमें इतनी ज्यादा मात्रा में कोयले का इस्तेमाल किया जाता है कि तीन घंटे में करीब ढ़ाई सौ किग्रा पीतल गलकर तरल पदार्थ के रूप में तब्दील हो जाती है।

पांच मिनट में सिर दर्द की समस्या
पीतल की भट्ठियों के आस-पास एक स्वस्थ व्यक्ति पांच मिनट से ज्यादा समय तक नहीं रुक पाता। इन भट्ठियों से निकलने वाले धुआं की वजह से स्वस्थ व्यक्ति को भी सिर दर्द, सीने में जलन और सांस लेने में परेशानी जैसी समस्याएं होने लगती हैं।
 

विज्ञापन

लोग कहते हैं...

इस कार्य को करने के लिए मास्क बहुत जरूरी है, लेकिन मजदूर इसे खरीद नहीं पाते और सरकार मास्क का वितरण नहीं करती है। यहां के पानी में भी भारी धातु के कण मिलते हैं। सरकार कोई मदद नहीं कर रही है।
राजेश कुमार

अभी तक यहां पर कोई स्वास्थ्य परीक्षण शिविर नहीं लगा है। बहुत कम लोगों के ही आयुष्मान कार्ड बने हैं। हमें तो परिवार के पालन-पोषण के लिए यह कार्य करना पड़ रहा है।
सोनू।

परिवार में तीन लोग हैं। बेटा मजदूरी करता है। मैं भी पीतल गलाने का कार्य करता था, लेकिन हृदय संबंधी बीमारी होने की वजह से घर बैठा हूं। आयुष्मान कार्ड भी नहीं बना है, जो उपचार करा लूं।
घनश्याम सिंह

पति को सांस की बीमारी है। वह काम नहीं कर पाते हैं। बेटा पीतल की मजदूरी करता है। हमें कोई सुविधा नहीं मिल रही है।
कुसुम।

पति को गले में कैंसर की बीमारी हो गई थी। सही तरीके से उपचार नहीं मिलने की वजह से उनका निधन हो गया। तीन बेटे हैं। सब पीतल गलाने की मजदूरी के कार्य से जुड़े हुए हैं।
बब्बो

पति को टीबी हो गई थी। इसकी वजह से उनका निधन हो गया। दो बेटे हैं। अब वह मजदूरी करते हैं। हवा चलने पर कबाड़े का रेत उड़ता है, लेकिन किसी ने मास्क का वितरण नहीं किया।
माहेश्वरी

कोई कार्ड नहीं बना है, जिसकी वजह से सरकारी सुविधा नहीं मिल पाती है। पति को सांस की बीमारी थी। किराए के घर में रहते हैं। बेटे अंगूठी बनाने का कार्य मजदूरी पर करते हैं।
धर्मवती

40 वर्ष पहले पति का निधन हो गया। आयुष्मान कार्ड नहीं बना है। धातु निकालने के कार्य की दो सौ रुपये की मजदूरी मिलती है। कुछ दिन पहले बुखार और खांसी की समस्या हो गई थी।
कलावती।

15 साल से पीतल गलाने का काम कर रहे हैं। एक दिन में पांच सौ रुपये मजदूरी मिलती है। बच्चों के मुरझाए चेहरे नहीं देखे जाते हैं। इस कार्य को करने में हाथ भी जल जाते हैं। गर्मियों में एक मिनट रुकना दूभर हो जाता है। इसके बावजूद यही कार्य करना पड़ रहा है।
प्रेम

14 साल से पीतल गलाने के कार्य में लगे हुए हैं। पीतल गलाकर सिल्लियां बनाने का काम होता है। धधकती भट्ठियों के पास रुका नहीं जाता है, लेकिन परिवार को पालने की मजबूरी में कार्य कर रहे हैं। 95 फीसदी आबादी इसी कार्य में लगी हुई है।
पिंटू

मंगलवार को थाना मझोला और थाना कटघर में 21 अवैध भट्ठियां बंद करवाई गई हैं। दो भट्ठियां सोमवार को बंद करवाई थीं। इन 23 भट्ठियों पर पौने दो करोड़ रुपये की पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति शुल्क लगाया है। जो लोग एक सप्ताह में जुर्माना जमा नहीं करेंगे, उनके खिलाफ आरसी निकालकर राजस्व विभाग द्वारा वसूली करा ली जाएगी। पीतल की शेष भट्ठियों को स्वत: बंद करने या गैस से संचालित करने का शपथ पत्र दे दें, अन्यथा सभी के खिलाफ बंदी और जुर्माने की कार्रवाई की जाएगी।  
अजय कुमार शर्मा, क्षेत्रीय प्रदूषण नियंत्रण अधिकारी
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें