राष्ट्रपति भवन में प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद के साथ अपनी शादी का केक काटते कर्नल यूनुस खां और उनकी पत्नी
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यूनुस खां भारत में ही रहे और भारतीय सेना की गढ़वाल रेजिमेंट का हिस्सा बने। 1948 के भारत-पाक युद्ध में दोनों भाई एक-दूसरे खिलाफ जंग लड़े। उस समय याकूब पाकिस्तान आर्मी में थे। कर्नल युनूस खां भारत के अंतिम गर्वनर जनरल सी राजगोपालाचारी और देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद के एडीसी भी रहे। उन्होंने जम्मू-कश्मीर राज्य के गर्वनर के एडीसी के रूप में भी कार्य किया।
1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान वह कश्मीर में तैनात थे। 1965 के भारत-पाक युद्ध के समय वह बरेली में नियुक्त थे। 1969 में कर्नल के पद से वो सेवानिवृत्त हुए थे। इसके बाद वह अलीगढ़ चले गए थे। वहीं इनके छोटे भाई साहबजादा याकूब सेना की नौकरी के बाद राजनीति में आ गए थे और वह पाकिस्तान के विदेश मंत्री तक रहे थे। वहीं यूनुस खां सेवानिवृत्त होने के बाद गुमनामी की दुनिया में खो गए। 1984 में उनका इंतकाल हो गया था। रामपुर के लोग भी अपने उस सपूत को भूल गए। जिलाधिकारी के प्रयास के बाद उनके बारे में रामपुर के लोगों को पता चल पाया है।
साहबजादा कर्नल यूनुस खां
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जिलाधिकारी, आंजनेय कुमार सिंह ने बताया कि साहबजादा कर्नल यूनुस खां रामपुर के वीर सपूत और सच्चे देशभक्त थे। देश के प्रति उनकी सेवाओं और योगदान को हमेश याद रखा जाना चाहिए। इसी सोच के तहत लॉकडाउन के दौरान उनके बारे में खोज को क्रिएटिव चैलेंज का हिस्सा बनाया गया था। कुछ लोगों ने बहुत सारे तथ्य जुटाए और जो ऐसा नहीं कर सके। उनको इतिहास से रूबरू कराया गया। हमारी पोस्ट पढ़ने के बाद उनके परिवार ने अपनी प्रशंसा जाहिर की।
पूर्व मंत्री नवाब काजिम अली खां ने कहा कि रामपुर रियासत को यह गौरव प्राप्त है कि यहां के लोगों ने हर क्षेत्र में देश और अपनी सरजमीं का नाम दुनिया भर में रोशन किया है। साहबजादा कर्नल याकूब खां का संबंध रामपुर के शाही घराने से था और उनकी देश के प्रति वफादारी और लगाव एक मिसाल है। लॉकडाउन के दौरान जिलाधिकारी ने उनके बारे में रुचि लेकर जिस प्रकार रामपुर के लोगों को इतिहास से रुबरू कराया है वह सराहनीय है।