मुरादाबाद। कोरोना काल में बच्चों की मासूम दुनिया बिल्कुल बदल चुकी है। अब शाम को पार्कों में खेलते-कूदते बच्चों की जगह सन्नाटा दिखाई देता है। शॉपिंग मॉल्स में बंजी जंपिंग करते बच्चों का शोर अब सुनाई नहीं देता। उनकी वो मस्ती, वो शैतानियां कहीं खो सी गई हैं। बच्चे, पार्क, मॉल्स सब अपनी जगह हैं, बस जिंदगी कुछ बदल गई है। ऐसे में वह अवसाद में आ रहे हैं। इन बच्चों पर सबसे ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है।
करीब चार महीने से बच्चों की आजादी और उनका बचपन छिन गया है। कोरोना वायरस के डर से बच्चे चार महीने से घरों में कैद हैं। वह अपने दोस्तों से भी नहीं मिल पा रहे है और बात-बात पर अभिभावकों की डांट पड़ती है, जिसके चलते वे अवसाद के शिकार हो रहे हैं। वहीं, दूसरी ओर आनलाइन पढ़ाई का बोझ भी उनके मासूम मन पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रहा है। मनोचिकित्सकों का कहना है कि घूमने-फिरने सहित बच्चों की आउटडोर एक्टिविटी और स्कूल बंद होने का सीधा असर उनके मन-मस्तिष्क पर पड़ रहा है।
मनोविश्लेषक डॉ. मीनू मेहरोत्रा का कहना है कि बच्चों की पढ़ाई को लेकर अभिभावकों और शिक्षकों को आपस में सांमजस्य स्थापित करना चाहिए। कामकाजी मां-बाप बच्चों के लिए समय निकालें। अवासदग्रस्त और परेशान बच्चों पर ज्यादा ध्यान दें। भावनाओं के बारेे में बात करें। उनसे घर के छोटे-छोटे कामों में मदद लें और रुचिकर कार्य कराएं। लगातार पढ़ाई के बीच में ब्रेक दें। उनके दोस्तों से फोन पर बात कराएं। अपने बचपन को याद करें और बच्चों को कुछ वक्त उनके मुताबिक कार्य करने दें।
मनोचिकत्सिकों का कहना है कि चंचल किस्म के बच्चे अटेंशन डिफेक्ट हाइपर एक्टिविटी डिसऑर्डर के शिकार हो रहे हैं। ऐसे बच्चों में हिंसक प्रवृत्ति भी पनप रही है। बच्चों को आनलाइन बुलिंग से बचाने के लिए बाल कल्याण समिति ने भी दिशा-निर्देश जारी किए हैं। मनोरोग विशेषज्ञ डॉ. कार्तिकेय गुप्ता का कहना है कि आउटडोर एक्टिविटी बंद होने से बच्चों के भावनात्मक और व्यवहार में बदलाव आ रहा है। आनलाइन क्लास से बच्चों का समय मोबाइल और कंप्यूटर पर बढ़ रहा है। जिसके चलते उनमें स्क्रीन एडिक्शन बढ़ रहा है। इससे वह उग्र हो जाते हैं और अभिभावकों से बहस करते हैं। जब उनकी बात नहीं मानी जाती तो उनमें गुस्सा और आक्रोश पैदा होता है।
डिजिटल ओपीडी में आ रहे सप्ताह में 20 मामले
मनोरोग विशेषज्ञ डॉ. नीरज गुप्ता का कहना है कि डिजिटल ओपीडी में सप्ताह में 15 से 20 मामले सामने आ रहे हैं। यह पहले की अपेक्षा बहुत ज्यादा हैं। पहले तीन से चार केस हाइपर एक्टिविटी और व्यावहारिक समस्याओं के आते थे। इसके लिए विहेबियर थेरेपी, एंगर मैनेजमेंट टेक्नीक, सोशल स्किल ट्रेनिंग, पेरेंट्स बिहेवियर ट्रेनिंग के जरिए अलग-अलग समस्याओं का इलाज किया जाता है।
सीडब्लूसी ने जारी किए दिशा-निर्देश
आनलाइन क्लास के दौरान बच्चों में आनलाइन बुलिंग जैसे अभद्र व्यवहार, अपशब्द बोलना जैसी प्रवृत्ति पनप रही है। इसके लिए बाल कल्याण समिति ने दिशा-निर्देश जारी किए हैं, जिसमें बुलिंग करने वाले बच्चों और उनके अभिभावकों की काउंसलिंग को जरूरी बताया है। अध्यक्ष बाल कल्याण समिति गुलजार अहमद ने बताया कि ऐसे बच्चों के अभिभावकों के लिए नोटिस जारी होने चाहिए। स्कूलों को आगे आकर बच्चों और अभिभावकों को समझाना चाहिए, ताकि अन्य बच्चे सुरक्षित रह सकें।