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परंपरा: 48 वर्षों से दशानन का पुतला बना रहा अरशद का परिवार, 12 वर्ष में दोगुना हुआ खर्चा, हर बार अलग डिजाइन

Tue, 04 Oct 2022 01:43 PM IST
शाहरुख खान अमर उजाला नेटवर्क, मुरादाबाद

सार

मुख्य कारीगर अरशद(45) का कहना है कि रावण का पुतला तो हर बार बनाते हैं लेकिन अलग डिजाइन रखना हर बार चुनौती होता है। कई बार रावण की मूछों को अलग डिजाइन दिया जाता है। पिछले चार वर्षों से पुतले की आंखों को घुमाने के लिए अलग तरकीब लगाई जा रहा है। इससे रावण का पुतला मेले में सबको घूरता नजर आता है। 
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दशानन का पुतला बना रहा अरशद का परिवार - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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पीतलनगरी की प्रसिद्ध लाइनपार रामलीला में 48 वर्षों से एक मुस्लिम परिवार दशानन रावण का पुतला तैयार कर रहा है। पहले दादा रियासुद्दीन पुतला तैयार करते थे, अब यह सिलसिला तीसरी पीढ़ी यानी पोते अरशद और आलम तक पहुंच गया है। 48 वर्षों से लाइनपार रामलीला में इनकी टीम 100 फीट का पुतला तैयार कर रही है।
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हालांकि कोरोना के समय पुतले का कद कम हो गया था। इसके बाद फिर से पुरानी परंपरा बरकरार रखी गई है। कारीगर अरशद ने बताया कि वह हर साल रावण का पुतला तैयार करने के लिए मेरठ से आते हैं। 32 साल पहले दादा को देखकर यह काम सीखा था। इसके बाद पिता को करते देखा। मुरादाबाद, काशीपुर समेत कई जनपदों में पुतले तैयार किए। 

अब 12 वर्षों से वह और उनका छोटा भाई आलम यह जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। कारीगरों का कहना है कि कभी हिंदू या मुस्लिम का ख्याल दिल में नहीं आया है। हर वर्ष यहां आते हैं तो कुछ लोग काफी लगाव रखने लगे हैं। आसपास के कुछ घरों की महिलाएं दोपहर में भोजन भी पहुंचाती हैं।
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हर बार रखते हैं अलग डिजाइन
मुख्य कारीगर अरशद (45) का कहना है कि रावण का पुतला तो हर बार बनाते हैं लेकिन अलग डिजाइन रखना हर बार चुनौती होता है। कई बार रावण की मूछों को अलग डिजाइन दिया जाता है। पिछले चार वर्षों से पुतले की आंखों को घुमाने के लिए अलग तरकीब लगाई जा रहा है। इससे रावण का पुतला मेले में सबको घूरता नजर आता है। 

कारीगरों ने बताया कि पुतले को बनाने के लिए पांच हजार बांस, 70 किलो रद्दी और 42 किलो सुतली का प्रयोग किया जा रहा है। इसके अलावा डिजाइनर कागज, आतिशबाजी अलग हैं।

12 वर्षों में दोगुना हो गया दशानन का खर्चा
अरशद और उनके बड़े भाई नजीर अहमद ने बताया कि 12 साल पहले पुतला बनाने में लगभग 50 हजार रुपये की लागत आती थी। अब साल दर साल यह खर्च बढ़ता जा रहा है। कुछ वर्षों में पुतले के साथ आतिशबाजी का चलन बढ़ा है। ऐसे में पटाखों सहित एक लाख रुपये से अधिक खर्च हो जाते हैं। कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले का चेहरा भी तैयार किया जा रहा है।

हमारे लिए तो हिंदू और मुस्लिम धर्म दोनों एक जैसे हैं। जैसे हमारे लिए अल्लाह हैं, वैसे ही हमारे लिए राम हैं। क्योंकि, यहां पर काम करके हमें रोजगार मिलता है, जिससे हमारे घर का चूल्हा जलता है। इसलिए हमें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता। रावण का पुतला बनाना हमारा पुश्तैनी काम है। - अरशद, मुख्य कारीगर
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