दूसरे विभागों का फर्जीवाड़ा पकड़ने वाले, इंटेलीजेंस, विजिलेंस जैसी टीमों से परदों के पीछे के रहस्य उजागर करने वाला पुलिस महकमा खुद के घर में चल रहे फर्जी नौकरी के खेल का राजफाश क्यों नहीं कर सका-यह सवाल इस वक्त हर आम और खास की जुबान पर और जेहन में है। सवाल उठाने वाले कटाक्ष भी कर रहे हैं कि बंटी-बबली की तरह जीजा-साले (अनिल-सुनील) की जोड़ी महकमे की आंखों में धूल झोंकती रही या जिम्मेदार आंखें मूंदे रहे।
ठाकुरद्वारा थाने में पांच साल फर्जी सिपाही के नौकरी करने का राज खुलने के बाद से हो रही किरकिरी बचाने के लिए पुलिस भले कह रही है कि स्थानांतरण आदेश पर फोटो नहीं होता। इसका लाभ लेकर अनिल ने बिलारी से तबादले के वक्त अपना स्थानांतरण आदेश साले सुनील को थमाकर ठाकुरद्वारा में आमद दर्ज करवा थी। लेकिन महकमे के ही जानकार बता रहे हैं कि आमद के वक्त हस्ताक्षर भी होते हैं। वही हस्ताक्षर, जो पुलिस रिकॉर्ड में किसी कर्मचारी की नौकरी शुरू होने के वक्त कराए जाते हैं और कदम-कदम पर इस्तेमाल होते हैं।
इसके अलावा इसके अलावा सर्विस बुक और सीआर (कैरेक्टर रोल) बुक जैसे अहम दस्तावेजों पर हस्ताक्षर के साथ फोटो का भी प्रयोग होता है। वेतन की शीट तैयार करके बैंक या कोषागार भेजी जाती है। समय-समय पर सीओ से लेकर जिले के पुलिस कप्तान तक के अफसर थानों के मुआयने भी करते हैं। चाल-ढाल और बातचीत के लहजे से अपराधी और बेकसूर को पकड़ लेने वाली अफसरों
की निगाहें इस मामले में कैसे चूक गईं।
पांच साल बाद फर्जीवाड़े का खुलासा एसएसपी दफ्तर पहुंचे शिकायती पत्र से होना यह दर्शा रहा है कि कहीं न कहीं जीजा-साले के खेल में पुलिस विभाग के कुछ और लोगों की भी मिलीभगत
है। देखना होगा कि फर्जी सिपाही की पांच साल ड्यूटी करके फरार हुए सुनील तथा इस खेल में शामिल अन्य वर्दीधारियों तक पुलिस कब तक पहुंचती है।
शिकायत मिलने पर जांच कराई गई थी। जांच में आरोप सही पाए गए हैं। सिपाही अनिल कुमार और उसके साले सुनील के खिलाफ केस दर्ज किया गया है। अनिल को गिरफ्तार कर लिया गया
है। सुनील की तलाश की जा रही है।
- पवन कमार, एसएसपी मुरादाबाद