मुरादाबाद। आजादी का यह दीवाना हमेशा याद किया जाएगा। लिखने पढ़ने की उम्र में तिरंगा थामकर दिल्ली कूच करने वाले शास्त्री जी एक ऐसी शख्सियत बने कि जो सियासत से लेकर जंग-ए-आजादी तक में पूरे जोश के साथ उतरे। उम्र के अंतिम पड़ाव में भी उनका जोश किसी नौजवान से कम नहीं था। अगर र्कोई समस्या लेकर पहुंच गया तो उसके साथ निकल पड़ते थे। उनके निधन के बाद शोक की लहर उनके पैतृक गांव से लेकर मुरादाबाद में डिप्टीगंज तक छाई हुई है।
अमरोहा जनपद के गांव जलालपुर धना में पैदा हुए थे ख्यालीराम शास्त्री। वर्ष 1917 में इनका जन्म एक किसान परिवार में हुआ। इनके पिता पंडित साधूराम शर्मा पेशे से किसान थे। ख्यालीराम संस्कृत पढ़ने दिल्ली यूनीवर्सिटी चले गए। यहीं से उन्हें शास्त्री की उपाधि मिली थी। इनके परिवार वालों की मानें तो पढ़ाई के समय में ही वह आजादी की लड़ाई में शरीक हो गए थे। शास्त्री की उपाधि मिलने से पहले ही वह जेल गए। उनके हम उम्र तो कम लोग रह गए लेकिन उनके साथ वक्त गुजारने वालों की फेहरिश्त लंबी है।
अंतिम यात्रा के वक्त उनके आवास पर सैकड़ों की भीड़ थी। सभी की आंखें नम..लोग उनके साथ बिताए पलों को और उनकी विशेषताओं को याद करते दिखे। उनके संघर्ष की कहानी एक दूसरे से लोग शेयर करते रहे।