महानगर में सीवर लाइन पहली बार ही नहीं डाली जा रही है। यहां पर 1978 में भी सीवर लाइन डाली गई थी। अब खुदाई में सीवर लाइन निकल रही है। उस समय 25 लाख रुपये की लागत से कलक्टर आफिस के सामने से रामगंगा तक सीवर लाइन डाली गई थी। सीवर को शहर से बाहर निकालकर गंदे पानी को नदी के पार ले जाकर आसपास के जंगल में सिंचाई को छोड़ा जाना था। अफसरों के भरपूर प्रयास के बावजूद सीवर लाइन सफल नहीं हो सकी थी।
आजकल गंगा और रामगंगा को स्वच्छ बनाने के लिए इसमें गिरने वाले सीवर को बंद करने को अभियान चल रहा था। जबकि आजादी के तत्काल बाद 1965 में औद्योगिक नगरी का महत्व दर्शाने और सीवर को शहर से बाहर निकालने के लिए सीवर लाइन डाली गई थी। सिर पर मेला ढ़ोने की कुप्रथा खत्म करने के लिए सीवर लाइन डालने का निर्णय अफसरों ने लिया था। उस समय मुरादाबाद नगर पालिका होती थी और इसका प्रशासक डीएम होता था।
नगर निगम के स्वास्थ्य विभाग में उस समय तैनात रहे वरिष्ठ लिपिक श्याम बाबू बताते हैं कि शासन ने 1965 में सीवर प्लान के लिए 25 लाख रुपये का बजट आवंटित किया था। सीवर लाइन को लोकल सेल्फ गवर्मेंट इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट (अब जल निगम) ने डलवाकर 1978 में काम पूरा किया था। कलक्ट्रेट आफिस से शुरू होकर सीवर लाइन गुरहट्टी, ताड़ीखाना, पारकर स्कूल, रेलवे स्टेशन के सामने हाईवे से होकर पुराना रामपुर रोड और धोबीघाट से निकालकर रामगंगा के दूसरी पार ले जाया गया। लाइन को चेक करने के लिए दस दिन तक नलकूप से पानी चलाया गया, लेकिन टेल तक नहीं पहुंचा। कटघर थाने के बराबर में पंपिंग सेट लगाने पर भी कामयाबी नहीं मिली। उसके बाद लखनऊ से आई जांच टीम ने चार इंजीनियरों को सस्पेंड किया था। दिल्ली के इंजीनियरों की टीम ने गांधीनगर में सीवर पंपिंग सेट लगाने की सिफारिश की थी, लेकिन तीन लाख रुपये का खर्च आने के चलते शासन ने अस्वीकार कर दिया। उस समय सीवर योजना फेल हो गई थी। नगर निगम, जल निगम और एलएंडटी ने पाया कि अब सीवर खुदाई में पहले डाली गई सीवर लाइन के पाइप जगह-जगह निकल रहे हैं।
अभी तक शहर में डाली गई सभी सीवर योजनाएं रहीं फ्लाप -
- न्यू मुरादाबाद में डाली गई सीवर लाइन और एसटीपी दोनों फेल पड़े हैं।
- आवास विकास की बुद्धि विहार में डाली गई सीवर लाइन आज तक कारगर नहीं हो सकी है।
- मानसरोवर कालोनी में डाली गई सीवर लाइन और एसटीपी नहीं चल सकी हैं।