चंदौसी। शासन ने फसल अवशेष को नहीं जलाने को अब लेखपालों के कर्तव्यों में शामिल कर दिया गया है। हल्का लेखपाल अब खसरे के अंतिम कालम फसल अवशेष जलाने व न जलाने के उल्लेख करेंगे। शासन के आदेश के बाद जिला प्रशासन ने इसको लेकर कवायद शुरू कर दी है। तीनों तहसीलों के लेखपालों को इस बाबत दिशा-निर्देश जारी किए है।
किसान फसल अवशेष को अधिकतर खेतों में जलाकर प्रदूषण को बढ़ावा दे रहे है। हरियाणा व पंजाब में खेतों में धान की पराली जलाए जाने का प्रभाव दिल्ली तक दिखाई दे रहा है। इस कारण दिल्ली में धुंध छा जाती है। लोगों को सांस लेना मुश्किल हो जाता है।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में काफी बड़े क्षेत्रफल में धान की फसल होती है। किसान इस धान के पुआल अथवा पराली को खेत में ही जला देते है। इस कारण प्रदूषण को बढ़ावा मिलता है। इसका प्रभाव भी दिल्ली एनसीआर पर पड़ता है। इसके विपरीत किसान अगर खेत में पराली जोत कर दबा देगा तो उसके खेत को खाद व अन्य तत्व मिलेंगे और प्रदूषण से भी बचा जा सकेगा। प्रदेश सरकार इसको लेकर काफी गंभीर है।
13 अक्तूबर को लखनऊ में हुई बैठक में निर्णय लिया गया है प्रदेश के लेखपाल अब खसरे के अंतिम कालम में पराली जलाने व न जलाने का उल्लेख करेंगे। लेखपाल के कर्तव्य में इस कार्य को विशेष रुप से शामिल किया कर दिया जाए।
लेखपाल द्वारा फसलों की पड़ताल के पश्चात फसल कटाई के बाद गांवो के प्रत्येक गाटे सर्वेक्षण किया जाएगा और खसरे के अंतिम टिप्पणी वाले कालम में फसल अवशेेष की वास्तविक स्थिति की सर्वे तिथि समेत अंकन किया जाएगा।
अगर अवशेष जलाए जाने की यदि स्थिति दिखाई देती है तो इस बात को भी खसरे में अंकित किया जाना जरूरी है। इसके बाद मंडलायुक्त व जिलाधिकारी भ्रमण कर इस बात की जांच करेंगे कि लेखपाल ने खसरे में उक्त उल्लेख किया है अथवा नही। शासन के निर्देश के बाद जिलाधिकारी ने तीनों तहसीलों के लेखपालों को इसको लेकर दिशा-निर्देश जारी किए हैं।