मुरादाबाद। जिले में मातृ-शिशु स्वास्थ्य सेवाओं की हकीकत चौंकाने वाली है। स्वास्थ्य विभाग की ही रिपोर्ट के मुताबिक, हर दूसरे दिन एक मासूम दुनिया में आने से पहले ही दम तोड़ रहा है। आंकड़े बताते हैं कि एक साल में 152 बच्चों की मौत गर्भ में ही हो गई। हर 48 घंटे में एक अजन्मी जिंदगी खत्म। यह सिर्फ संख्या नहीं, बल्कि स्वास्थ्य तंत्र की लापरवाही की तस्वीर है।
चौंकाने वाली बात यह है कि 96 मामलों में गर्भ में ही बच्चों का शरीर अपघटित होने लगा, लेकिन गर्भवती महिलाओं को इसकी भनक तक नहीं लगी। यानी न समय पर जांच, न निगरानी, और न ही कोई चेतावनी। बाकी 56 मामलों में बच्चों की दिल की धड़कन जन्म से ठीक पहले थम गई। इन्हें स्टिल बर्थ की श्रेणी में रखा गया है। जिले में स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी का बहाना भी नहीं बनाया जा सकता। करीब 350 स्वास्थ्य उपकेंद्र, नौ सीएचसी, 27 पीएचसी और 50 हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर होने के बावजूद हालात बदतर हैं।
इन केंद्रों की जिम्मेदारी गर्भवतियों की नियमित जांच (एंटी नेटल केयर), पोषण और जोखिम की पहचान करना है। लेकिन, जमीनी हकीकत इसके उलट है। साल में करीब पांच माह सरकारी कूपन के जरिये निशुल्क अल्ट्रासाउंड नहीं हुए। माना जा रहा है कि इसके कारण भी कई महिलाएं गर्भावस्था के दौरान जांच नहीं करा सकीं। मुरादाबाद शहर में ही 26 ऐसे मामले सामने आए, जहां बच्चों ने जन्म से कुछ पहले दम तोड़ा।
40 मामलों में तो स्थिति इतनी भयावह थी कि बच्चे कई दिन पहले ही मर चुके थे और उनका शरीर सड़ने लगा था। वहीं डॉक्टरों का कहना है कि स्टिल बर्थ के इन मामलों में अन्य कई कारण हो सकते हैं।
यह आंकड़े बताते हैं कि स्वास्थ्य विभाग की निगरानी व्यवस्था कागजों तक सीमित है। गर्भवती महिलाओं की नियमित जांच, जागरूकता और समय पर इलाज के दावे खोखले साबित हो रहे हैं।