मुरादाबाद। दीपावली में प्राचीन काल से चली आ रही मिट्टी के दीयों की प्रथा पर आधुनिकता की वजह से उदासी छाई हुई है। मोम और इलेक्ट्रिक दीयों के आगे मिट्टी के दीयों के खरीदार नहीं मिल रहे हैं। दुकानदारों का कहना है कि धनतेरस के त्योहार से अब उम्मीद लगी हुई है।
बर्तन बाजार के आरके अग्रवाल ने बताया कि चीन के इलेक्ट्रिक दीपक, लैंप हैं, जो एक बार चार्ज करने के बाद तीन से चार घंटे तक जलते हैं। इलेक्ट्रिक घड़ी, फोटो फ्रेम, फ्लॉवर पाट लोगों को लुभा रहे हैं। धनवर्षा करने वाली लक्ष्मी-गणेश की इलेक्ट्रिक मूर्तियां भी हैं। इन्हें बिजली से जोड़ते ही मां लक्ष्मी की मूर्ति के हाथ से सिक्के रूपी लाइट निकलने लगती है। मोम के कमल और गुलाब के दीपक भी हैं, जिन्हें जलाने पर उजाले के साथ खुशबू बिखर जाती है। अलग-अलग आकार के होने की वजह से जलने के समय में भी अंतर है।
बंगला गांव की कमलेश ने बताया कि दीये का पुस्तैनी काम है। पहले भाई अपने आप दीये बनाते थे। उनके बाद अब बरेली के एक गांव से छह सौ रुपये के हजार दीये मंगवाए हैं। कुल 60 हजार का माल मंगवाया है। सिर्फ रस्म अदायगी के लिए प्रयोग होने की वजह से पिछले चार दिन में अभी पांच-छह हजार रुपये की बिक्री हुई है। कोतवाली पर दुकानदार प्रेमवती ने बताया कि सादा दीपक के साथ पेंट किए रंगीन दीपक की मांग बढ़ी है। चार दीपक का जोड़ा 20 रुपये का है। पिछले एक माह से पूरा परिवार दीयों को सजाने के काम में लगा हुआ है।