संभल। मंदी और घाटे से जूझ रहे चीनी उद्योगों के लिए चीनी का कोटा घटाए जाने से थोड़ी सी राहत मिली है। चीनी के दाम सुधरे हैं, लेकिन यूपी की चीनी मिलों और किसानों को इससे ज्यादा फायदा नहीं मिल रहा है। किसानों का गन्ना मूल्य भुगतान अभी तक फंसा हुआ है। संभल के किसानों के 242.58 करोड़ रुपये फंसे हुए हैं। जबकि पूरे यूपी में किसानों के 11,479 करोड़ रुपये का भुगतान बकाया है। चीनी का उत्पादन ज्यादा होने के बाद भी यूपी को बिक्री का कोटा कम कर दिया गया। इसका खामियाजा न केवल चीनी मिलें उठा रहीं हैं, बल्कि किसान भी भुगत रहे हैं। चीनी बिक्री का कोटा आवंटित करते वक्त महाराष्ट्र के मुकाबले यूपी के संग भेदभाव किया गया है।
जून में चीनी की बिक्री का कोटा 21 लाख मीट्रिक टन था जो जुलाई के लिए घटाकर 16.5 लाख मीट्रिक टन कर दिया गया। जून में कई चीनी मिल कोटे की चीनी नहीं बेच पाए थे। चीनी का कोटा राष्ट्रीय स्तर पर कम किए जाने से चीनी की मांग बढ़ी और भाव में भी सुधार हुआ। फरवरी 2018 में न्यूनतम 2600-2700 रुपये प्रति क्विंटल के दाम पर बिकने वाली चीनी का दाम धीरे-धीरे बढ़ा है। जुलाई में 3250-3350 रुपये तक पहुंच गया है। चीनी उद्योग से जुड़े प्रतिनिधियों का कहना है कि बाजार भाव सुधरने और बिक्री का कोटा प्रणाली लागू होने के बाद खपत सामने आने लगी है। चीनी उद्योग थोड़ी सी राहत में है, लेकिन इसका लाभ तभी सामने नजर आएगा जब यूपी को उत्पादन के सापेक्ष चीनी की बिक्री का कोटा दिया जाएगा।
उत्तर प्रदेश चीनी मिल एसोसिएशन ने एक अहम खुलासा किया है कि सितंबर तक जितनी चीनी बेचने का कोटा दिया गया है, उससे केवल 7500 करोड़ रुपये मिल सकेंगे। ऐसे में 13000 करोड़ रुपये के गन्ना मूल्य का भुगतान कैसे हो सकेगा। यूपी शुगर मिल एसोसिएशन का तर्क है कि महाराष्ट्र के मुकाबले यूपी को चीनी की बिक्री के लिए कोटा कम कर दिया गया है। जबकि यूपी में महाराष्ट्र के मुकाबले चीनी उत्पादन अधिक है। केंद्र सरकार अगर यूपी के उत्पादन को कोटा तय करते समय ध्यान में रखा होता तो ऐसा नहीं होता।
यह हैं आकंड़े
जून में महाराष्ट्र को 8,14,274 मीट्रिक टन का कोटा दिया गया था। जुलाई का लिए 6,33,540 मीट्रिक कोटा महाराष्ट्र का था। जबकि यूपी को जून में 6,24,890 मीट्रिक टन और जुलाई में 5,48,361 मीट्रिक टन का कोटा दिया गया। यूपी शुगर मिल एसोसिएशन के सचिव का कहना है कि अगर सरकार भुगतान की स्थिति में सुधार चाहती है तो चीनी उद्योग की समस्याओं के बारे में समग्र तरीके से विचार करना होगा। केंद्र सरकार को कोटा तय करते वक्त यूपी को महत्व देना पड़ेगा। उन्होंने कहा कि अगर मौजूदा रफ्तार से ही चीनी बिक्री का कोटा दिया गया तो इतने रुपये जुटाने में मिलों को 21 महीने लग जाएंगे।
अपनी मर्जी से ज्यादा चीनी नहीं बेच सकेंगी मिलें
संभल। अब ऐसा नहीं है कि चीनी मिलें अपनी मर्जी से कितनी भी मात्रा में चीनी बेच सकेंगी। क्योंकि केंद्र सरकार के खाद्य मंत्रालय ने चीनी उद्योग को कोटा सिस्टम के अंतर्गत चीनी बेचने की अनुमति दी है। सरकार तय करेगी कि किस मिल को किस महीने में कितनी चीनी बाजार में बेचनी है। चीनी की बिक्री 29 रुपये प्रति किलोग्राम से कम रेट पर नहीं हो सकेगी। सरकार भले ही चीनी उद्योग को जहां घाटे से उबारना चाहती हो पर कोटा प्रणाली और सरकार के पैकेज से अभी ऐसा नहीं हो पा रहा है।