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पोषक तत्वों की कमी से बंजर होने को है जमीन

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मुरादाबाद।
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मंडल के खेतों में मुख्य पोषक तत्व जीवाश्म (कार्बनिक तत्व) की कमी खतरनाक स्तर पर पहुंच गई है। किसान मृदा स्वास्थ्य पर ध्यान नहीं दे रहे हैं। ऐसे में जरूरी 17 पोषक तत्वों के सापेक्ष किसान तीन सामान्य तत्वों पर ही खेती कर रहे हैँ। जिसकी वजह से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में खेती की जमीन जमीन कुपोषण की चपेट में आने लगी है और बंजर होने का खतरा मंडराने लगा है।
किसानों की अधिक से अधिक पैदावार लेने की आदत ने जमीन को कमजोर बना दिया है। इन दिनों स्वस्थ्य जमीन में फसलों को 17 पोषक तत्वों के सापेक्ष करीब सात तत्व ही मिल रहे हैं। हरित क्रांति के दौर में केवल नाइट्रोजन की कमी थी। उन दिनों यूरिया मिलते ही बंपर पैदावार होने लगी। उसके बाद से किसान यूरिया से ही खेती कर अधिक उत्पादन ले रहे हैं। जिसकी वजह से सबसे ज्यादा कमी नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटास, जिंक, बोरान और कार्बनिक तत्वों की हो गई है। अधिक पैदावार लेने का सबसे ज्यादा असर कार्बनिक (जैव) तत्वों पर पड़ रहा है। कृषि वैज्ञानिक डा. विवेकराज सिंह के अनुसार जैव तत्वों की कमी से पैदावार में गिरावट आनी शुरू हो गई है।
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जीवाश्म का मानक -
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आदर्श .08 से 1.02 फीसदी
स्वस्थ 0.6 से 0.8
नाजुक 0.6 से 0.4
बीमार 0.4 से कम
मंडल की स्थिति 0.3.05
बंजर की स्थिति 0.2 से कम पर (खेती की विधि नहीं बदली तो आठ-10 साल में यह स्थिति आ जाएगी)
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घट रही जल संचय क्षमता -
पांच साल पहले गेहूं की फसल की तीन-चार सिंचाई करनी पड़ती थीं। आजकल पांच-छह बार सिंचाई करनी पड़ रही हैं। जैव तत्वों की कमी से जमीन की समस्त जैविक क्रियाएं धीमी होने लगती हैं। इससे जमीन में शैवाल और कवक खत्म होने शुरू हो जाते हैं, जिससे पेड़ों की वृद्धि रुक जाती है।
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वेस्ट यूपी के खेतों में कार्बनिक तत्वों (जीवाश्म) की कमी खतरे के निशान तक हो गई है। मृदा परीक्षण के बिना मनमाने तरीके से उर्वरक प्रयोग होना खतरनाक है। तत्काल जैविक खेती की ओर नहीं लौटे तो जमीन बंजर हो जाएगी। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पैदावार का स्तर ठहर गया है।
- डा. एसएल यादव, डिप्टी डायरेक्टर एग्रीकल्चर सुरक्षा।
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