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पांच राज्यों के नतीजों ने उड़ाई सांसदों की नींद

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मुरादाबाद।
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पांच राज्यों के चुनावी नतीजों ने मंडल के भाजपा सांसदों की नींद उड़ा दी है। मंडल की सभी छह लोकसभा सीटों पर इस समय भाजपा का कब्जा है। मतदाताओं के बदलते मूड और कार्यकर्ताआें में पनपे असंतोष के बीच भाजपा को 2019 में 2014 के नतीजों को दोहराना आसान नहीं होगा। हिंदी बेल्ट के तीन राज्यों मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में सत्ता गंवा चुकी भाजपा के लिए यूपी का गढ़ बचाना बड़ी चुनौती होगी। फिलहाल इसे लेकर सबसे ज्यादा चिंतित भाजपा सांसद हैं। सपा और बसपा के गठबंधन की चर्चाएं इनकी चिंताओं को बढ़ा रही हैं।
2014 में मोदी लहर के दौरान मंडल की सभी छह सीटों पर भाजपा का कमल खिला था। मुरादाबाद में कुंवर सर्वेश सिंह सपा के डा. एसटी हसन को 93 हजार वोटों से हराकर सांसद बने तो संभल में सपा के डा. शफीकुर्रहमान को 5174 मतों से हराकर भाजपा के सत्यपाल सिंह सैनी सांसद बने। अमरोहा में भाजपा के कंवर सिंह तंवर ने तत्कालीन सपा सरकार के कैबिनेट मंत्री कमाल अख्तर की पत्नी हुमैरा अख्तर को डेढ़ लाख से भी अधिक मतों से हराया था। मोदी की आंधी में रामपुर में आजम के करीबी नसीर खां को करीब 27 हजार वोटों से हराकर भाजपा प्रत्याशी डा. नैपाल सिंह सांसद बने थे। बिजनौर में भाजपा के कुंवर भारतेंदु सिंह ने सपा के शहनवाज राणा को दो लाख से भी अधिक वोटों से हराया था। नगीना से भाजपा के डा. यशवंत सिंह ने सपा के निवर्तमान सांसद यशवीर सिंह को 92 हजार मतों से हराया था।
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पांच राज्यों के चुनावी नतीजों के बाद सांसदों की नींद उड़ गई है। 2014 में इन छह सीटों को बचा पाना भाजपा के लिए बड़ी चुनौती है। बसपा और सपा का गठबंधन हुआ तो भाजपा सांसदों को अपनी सीटें बचाना मुश्किल होगा। भाजपा के परंपरागत वोटरों में पनप रहे गुस्से और कार्यकर्ताओं के असंतोष से भाजपा सांसद और संगठन के ओहदेदार अंजान नहीं हैं। एससी/ एसटी एक्ट पर सवर्णों की नाराजगी को दूर करना सांसदाें के लिए चुनौती है। भाजपा का कट्टर समर्थक वर्ग भी सरकार से मंदिर मुद्दे पर निर्णायक कदम चाहता है। पांच राज्यों में भाजपा की हार के बाद भाजपा संगठन से जुड़े पदाधिकारी भी सोशल मीडिया पर पार्टी को सबक लेने की नसीहत दे रहे हैं। कहीं मंदिर मुद्दे पर ढुलमुल रवैय्ये से कार्यकर्ता नाराज हैं तो कहीं नौकरशाही का भ्रष्टाचार खत्म नहीं कर पाने का गुस्सा है।
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