भगवान श्रीकृष्ण की जन्मस्थली से गुजरातियों का अटूट रिश्ता है। यमुना मैया के पूजन से लेकर उनकी रक्षा के लिए हुए आंदोलन तक गुजरात सदा मथुरा के साथ खड़ा हुआ है। प्रभु यहां से जाकर द्वारिकापुरी में रहने लगे थे।
गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी सोच समझकर उत्तरप्रदेश में पहली सभा के लिए श्रीकृष्ण की नगरी को चुना है। गत चुनाव में अयोध्या कार्ड न चल पाने के बाद इस बार भाजपाई कान्हा की जन्मभूमि से दिल्ली का रास्ता तलाश रहे हैं।
उत्तरप्रदेश और बिहार में लोकसभा की 120 सीटें हो जाती हैं। इसलिए इन्हीं दो राज्यों पर मोदी का सबसे अधिक ध्यान है। यहां फेल हुए तो ‘मिशन 2014’ का सपना टूटना तय है। इससे भाजपा के रणनीतिकार भी परिचित हैं।
पहले श्रीराम की जन्मभूमि अयोध्या में मोदी के आगमन की चर्चाएं परवान चढ़ीं थी लेकिन अब उनका दो अक्टूबर को मथुरा आने का कार्यक्रम यूं ही नहीं बन गया है।
भाजपा के सूत्र बताते हैं कि एक तो मथुरा दिल्ली के सबसे निकट है, दूसरे श्रीकृष्ण की नगरी है। इसलिए देश की सत्ता पर काबिज होने के लिए मोदी के रणनीतिकारों ने पहली सभा के लिए मथुरा का चयन किया है।
हिंदी कैलेंडर के अनुसार इस बार दो अक्टूबर को पंडित दीनदयाल उपाध्याय की जयंती पड़ रही है। जन्मोत्सव समिति के उपाध्यक्ष बांकेबिहारी माहेश्वरी कहते हैं कि यहां से इस आशय का प्रस्ताव किया गया था। अच्छा है कि मोदी आएंगे।
हालांकि नरेंद्र मोदी भारतीय जनता पार्टी की प्रदेश कार्य समिति की बैठक में भी भाग लेने वाले हैं, जो सितंबर में प्रस्तावित है। यह बैठक भी इस बार मथुरा में होने जा रही है।
भाजपा राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य रविकांत गर्ग ने बताया कि मथुरा श्रीकृष्ण की जन्मभूमि है। यहां से गुजरात के लोगों की अटूट आस्था जुड़ी है।
भगवान श्रीराम के आदर्शों के साथ ही वर्तमान में सियासत का जो दौर है उसमें जीत हासिल करने के लिए प्रभु श्रीकृष्ण की कलाएं भी जरूरी हैं। मोदी का मथुरा से सभाओं का शुभारंभ करना अतीत की आस्था का नतीजा है।