अक्षयनवमी के दिन लोगों ने आंवला के वृक्ष की पूजा की व आंवले के पेड़ के नीचे भोजन किया। अक्षय नवमी पर आंवला पूजन का विशेष महत्व है। इसीलिए इसका नाम अमृतफल भी है। अक्षयनवमी के दिन तो इस पेड़ की पूजा, इसके नीचे साधना, बैठना, भोजन बनाना उत्तम स्वास्थ्य की गारंटी भी है।
आंवला कफ, वायु, पित्तनाशक होता है। शरीर में इन त्रिदोषों के असंतुलित होने से भी व्यक्ति पर सत, रज और तम गुण का प्रभाव घटता बढ़ता है। आंवले को किसी भी रूप में सेवन करने से लाभ है। कच्चे आंवले के अलावा उबालकर, जलाकर, सूखाकर चाहे जिस रूप में प्रयोग किया जाए तो शरीर के रस-रसायन में संतुलन होता है। शरीर के रस-रसायन में विकृति से बीमारियां बढ़ती हैं। यह अमृतफल %चिर-युवा% बनाता है तो नेत्रज्योति बढाने में इसकी अद्भुत भूमिका है। आंवले को वैद्यराज या डॉक्टर की उपाधि दी जाए तो गलत नहीं होगा। यदि कार्तिक माह से प्रारंभ कर माघ माह तक एक हजार आंवले का सेवन कोई व्यक्ति कर ले तो हल्का दृष्टिदोष के चलते चश्मा लगा है तो उसकी जरूरत नहीं पड़ेगी। आयुर्वेद के अनुसार पथरी,पायरिया, बवासीर, कब्ज, बालों की सुरक्षा प्रदान करने का जैसे इसे वरदान प्राप्त है। पं. सलिल पांडेय ने बताया कि कार्तिक माह की महत्ता के क्रम में स्कंदपुराण के वैष्णव खंड के कार्तिक मास माहात्म्य में 15 अध्याय इसकी महत्ता में लिखी गयी है, जिसमें यह दर्शाया गया है कि जब पूरा जगत जल में डूब गया था तब ब्रह्माजी उद्विग्न हो गए। वे परब्रह्म के दर्शन के लिए इतने व्याकुल हुए कि नारायण के दर्शन के लिए उनकी आंखों से आंसू निकले। आंसूओं की बूंदे धरती पर पड़ी जिससे आंवला वृक्ष उत्पन्न हुआ। क्योंकि आंवला नारायण को बहुत पसंद था। पुराणकार के अनुसार धरती का प्रथम वृक्ष आंवला ही है। इसीलिए कार्तिकमाह में तो हर दिन आंवले के सेवन का विधान जहां आध्यात्म-सम्मत है, वही आयुर्वेद के अनुसार इस अवधि में पैदा हुआ आंवला स्वास्थ्य के लिए रामबाण है।