नगर के बुंदेलखंडी स्थित श्री द्वारकाधीश जी महाराज मंदिर में चल रहे भक्तमाल रसधारा के दूसरे दिन वृंदावन धाम से पधारे श्री चित्र-विचित्र जी महाराज ने भक्ति-ज्ञान की गंगा बहाई। कथा के तहत महाराज जी ने भक्तिमती रानी रत्नावती एवं श्री बांके बिहारी जी की ललित कथा प्रसंगों का भावपूर्ण वर्णन कर मौजूद भक्तजनों को निहाल कर दिया।
कथा के बीच-बीच में सुमधुर भजनों के संगीतमय प्रवाह से पूरा वातावरण भक्तिमय हो रहा था। भक्तमाल रसधारा के तहत श्री चित्र-विचित्र जी महाराज ने कहा कि भक्तिमती रत्नावती राजस्थान की रानी थीं, जो भगवान श्रीकृष्ण की परम भक्त थीं। मीराबाई की तरह इनका जीवन भी सांसारिक कष्टों के साथ बीता, परंतु इन्होंने संतों की सेवा एवं ईश्वर की आराधना नहीं छोड़ी। भगवान के परम भक्तों की एक लंबी श्रृंखला है।
महाराज जी ने कहा कि जिसे ईश्वर से प्रेम हो जाता है, वह इस नश्वर संसार से विमुख हो जाता है। महाराज जी ने कहा कि ब्रजभूमि में संत सूरदास जी भी हुए जो जन्म से अंधे थे। इनकी श्रीकृष्ण में परम भक्ति थी। एक बार मार्ग में जाते हुए कुएं में गिर गए तो श्रीकृष्ण ने उन्हें बाहर निकाला था।
कथा के दौरान श्री वृंदावन धाम के राजा बांके बिहारी जी का प्राकट्य महोत्सव मनाया गया, उनकी सेवा में व्यास द्वय ने सुमधुर भजनों एवं ललित कथा प्रसंगों से उपस्थित भक्तों को आनंदित किया। कथा की समाप्ति के पश्चात भव्य आरती हुई तथा उपस्थित भक्तों के बीच प्रसाद का भी वितरण किया गया।