चुनार। इस साल दशहरा पर भले ही कोरोना के चलते 177 वर्ष से चली आ रही रामलीला की परंपरा टूटी, लेकिन लीला की यादें ताजी हैं। ऐसी ही चुनार की रामलीला की यादें हैं। लगभग सौ वर्ष पूर्व रामनगर की लीला से प्रेरणा लेकर नगर में भी रामलीला कराये जाने की भक्ति भावना स्थानीय लोगों में जागृत हुई। यहां के द्वारिका प्रसाद पांडेय, बिसुन प्रसाद अग्रवाल, काशी प्रसाद अग्रवाल, पं. बेचन महराज, पारसनाथ अवस्थी के पूर्वजों ने मिलकर रामलीला का मंचन करने की योजना बनायी।
मंचीय कार्य संचालन के लिए पात्रों की उपलब्धता की समस्या सामने आयी तो रौनियार व ब्राह्मण समाज के लोग आगे आये और नि:स्वार्थ भक्ति भाव से आपसी सहयोग से पात्रों के लिए पोशाक, अस्त्र शस्त्र की व्यवस्था की। पात्रों के रूप में जिम्मेदारी उठायी। पहले यह रामलीला सात दिनों तक नगर के राघवजी मंदिर व आसपास के विभिन्न स्थानों पर आयोजित होती रही। बाद में श्रीराघवेंन्द्र रामलीला नाट्य समिति से नाम से कमेटी का गठन हुआ। सन् 1900 ई. के आसपास स्थायी रूप से रामलीला मंचन के लिए मिर्जापुर के कैलाशनाथ अग्रवाल के पूर्वजों ने दान स्वरूप भूमि उपलब्ध करायी। भूमि उपलब्ध होने के लगभग 35 वर्ष बाद रामलीला प्रेमी बद्री बाबा व खदेरन साव ने भवन व मंच का निर्माण कराया और उसी समय से 21 दिवसीय रामलीला का मंचन शुरू हुआ, जो अब तक निर्बाध रूप से भक्ति प्रेमियों के लिए जारी है। 21 दिनों तक चलने वाली रामलीला के मंचन के दौरान रामबारात, कालीजी का जुलूस, रावण वध (विजयादशमी) व चारों भाइयों का मिलन (भरत मिलाप) सनकसनंदन यह पांच लीला अलग अलग स्थानों पर होती रही है। शेष 16 दिनों की लीला नियत स्थान रामलीला मंच पर होती है।
मेला लगता था रामलीला स्थल के पास
चुनार। रामलीला को देखने के लिए नगर सहित आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों के लीला प्रेमी नियमित रूप से आते हैँ। इस दौरान नगर की पटरियों पर तरह तरह की खाद्य सामग्री, खिलौने इत्यादि की दुकानें सजी रहती हैं। देर रात तक चहल पहल बनी रहती है। लेकिन वैश्विक महामारी कोविड- 19 के चलते नगर की प्रसिद्ध रामलीला का मंचन न होने से जहां लोगों की भक्ति भावना आहत हुई है। वहीं इन छोटे छोटे पटरी व्यवसायियों को भी भारी भरकम आर्थिक क्षति हुई। महामारी के चलते इस वर्ष 177वें रामलीला का मुकुट पूजन की परंपरा का निर्वहन मात्र औपचारिकता पूर्ण कर की गयी है।
पांडेय बेचन शर्मा उग्र बनते थे सीता
चुनार। प्रसिद्ध साहित्यकार पांडेय बेचन शर्मा उग्र इस रामलीला में माता सीता का अभिनय करते थे। उनका लगभग पूरा परिवार ही रामलीला के मंचन से जुड़ा रहा। इस रामलीला का वर्णन श्रीराम कथा वाचक संत मोरारी बापू ने मारीशस में रामकथा के दौरान किया था। उन्होंने चुनार की रामलीला के धनुष यज्ञ की लीला का वहां वर्णन किया था।
- रामलीला मंचन न होने से मन खोया खोया सा रहता है- बार- बार अपने अभिनय का चित्रण दिमाग में गूंजता रहता है। अभिनय के दौरान नियमित रूप से खान पान रहन सहन स्वत: परिवर्तन दिखाई देता था लगता था यह बदलाव प्रभु के लीला के मंचन का असर था।
किशन मिश्रा (लक्ष्मण)
- भले ही रावण का अभिनय करता था लेकिन रामलीला के दौरान दिनचर्या में बदलाव रहता था। मंचन के दौरान पहने हुए रावण के पोषाक को उतारते ही प्रभु श्रीराम का मन में नाम स्मरण कर उनसे आशीर्वाद की प्रार्थना करता था। रामलीला मंचन न होने से अच्छा नही लग रहा है।
गोबिंद जायसवाल (रावण)
प्रभु से यही प्रार्थना करता हूं कि अपने भक्तों पर अपनी कृपा बनाये रखे और वैश्विक महामारी को दूर करें।
- रामजी साहू, पूर्व संरक्षक
प्रभु की इच्छा नहीं थी। शायद इसलिए ही रामलीला का मंचन नही हो रहा है।
- चन्द्रहास गुप्ता, पूर्व कमेटी अध्यक्ष।
नियमित रामलीला देखने जाता था। मंचन के दौरान प्रभु श्रीराम के नाम के जयघोष से मन पवित्र हो जाता था।
- विजय मिश्रा।
जीवन में पहली बार ऐसा देखने को मिला जब रामलीला का मंचन नही हुआ। लीला मंचन न होने का काफी तकलीफ महसूस कर रहा हूं।
- साहबराम।