मां विंध्यवासिनी के उपनाम से विख्यात कजरी को संरक्षित एवं संवर्धित किए जाने पर जोर दिया जा रहा है। वर्ष 1905 के दौरान कजरी की स्वराजी विधा प्रचलन में आई। जो लोगों को गुलामी की जंजीर तोड़कर आजादी की अलख जगा रही थी। स्वतंत्रता संग्राम में कजरी के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता है।
ये विचार विंध्याचल स्थित एक अतिथि भवन में उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी लखनऊ के तत्वावधान में पं. महेश्वर पति त्रिपाठी की स्मृति में आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रम व कजरी संगोष्ठी में वक्ताओं ने व्यक्त किए। संगोष्ठी में कजरी के अतीत और वर्तमान पर चर्चा की गई। वक्ताओं ने कहा कि आजादी के लिए स्वराजी विधा के गायन की शैली कजरी में ही मिलती है। मंडलायुक्त योगेश्वर राम मिश्र, पद्म श्री राजेश्वर आचार्य एवं पद्म श्री अजिता श्रीवास्तव ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्ज्वलित कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया।
मंडलायुक्त ने बताया कि मां विंध्यवासिनी के उपनाम से विख्यात कजरी को संरक्षित एवं संवर्धित किए जाने पर जोर दिया जा रहा है। वर्ष 1905 के दौरान कजरी की स्वराजी विधा प्रचलन में आई। जो लोगों को गुलामी की जंजीर तोड़कर आजादी का अलख जगा रही थी। स्वतंत्रता संग्राम में कजरी के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता है।
उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी के अध्यक्ष राजेश्वर आचार्य ने कहा कि सांस्कृतिक वाचक कलाकार दया नहीं सत्कार के पात्र हैं। इनकी सेवा करने के लिए मुहिम चलायी गयी थी। सांस्कृतिक धरोहरों को संजोने वाला हर कलाकर सम्मान और सत्कार का पात्र है। कजरी को संरक्षित रखने के लिए प्रदेश सरकार की तरफ से योजना शुरू की गई है।
कार्यक्रम संयोजक कजरी गायिका पद्म श्री अजिता श्रीवास्तव ने काशी बसे शिव के त्रिशूल और चल न झूला झूल आई ननदी... गीत की प्रस्तुति की। उन्होंने कहा कि लोक विधा कजरी के संवर्द्धन में पं. महेश्वर पति त्रिपाठी का विशेष योगदान था। उन्होंने बताया कि अध्यापन कार्य से सेवानिवृत्त होने के बाद वे नई पीढ़ी को धरोहर रूपी कजरी को बांटने में जुटी हैं। इस दौरान पं. महेश्वर पति त्रिपाठी के शिष्य मनीष शर्मा ने भावपूर्ण नृत्य प्रस्तुत किया। दीपांकर भट्टाचार्य ने गायन से लोगों को मंत्रमुग्ध कर दिया। इस मौके पर डॉ. सरिता त्रिपाठी, डॉ. माया त्रिपाठी, जय कुमार, केबी लाल श्रीवास्तव, शिवराम शर्मा, संजय श्रीवास्तव, राजपति ओझा, दिनेश्वर पति त्रिपाठी आदि मौजूद थे।