शेरवां पहाड़ी पर स्थित ऐतिहासिक किला
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महाभारत कालीन राजा भूरिश्रवा ने अपने अल्पकालीन शासनकाल में शेरवां स्थित पहाड़ी के भू-भाग में 52 बीघे में किला बनवाया था, जो खंडहर में तब्दील हो चुका है। पहाड़ी पर धरोहराें की लंबी श्रृंखला है। उत्तरी छोर के नीचले भू-भाग में प्राचीन इमारतों के भग्नावशेष बिखरे पड़े हुए हैं। भारतीय पुरातत्व व पर्यवेक्षण विभाग का रवैया उदासीन होने से ऐतिहासिक महत्व की अनेक स्मृतियां मिट्टी में मिलती जा रही हैं।
ऐतिहासिक किले की नक्काशीदार बारादरी एवं उस पर उकेरी गई गुफा स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना है। 50 बीघे में फैले किले के अवशेष को गहरवारों का किला बताया जाता है, जिसे आठवीं से बारहवीं शताब्दी के मध्य का होना बताया जाता है। किले का अधिकांश भाग तो नष्ट हो चुका है, लेकिन शेरवां-चकिया मार्ग पर शेरवां गांव के दक्षिणी पहाड़ी के उत्तरी भू-भाग इसकी प्राचीर नष्टप्राय दशा में पहुंच चुकी है। इमारतें किले की बुलंदी का प्रत्यक्ष प्रमाण देती हैं।
खंडहरों के आसपास बिखरी नक्काशीदार बेजोड़ कलाकृतियां पत्थरों पर खुबसूरत ढंग से उकेरी गई हैं, जिसमें जीवंतता की कोई कमी नहीं है। सफेद, बलुआ तथा लाहौरी पत्थर पर बनी कला कृतियां उसी तरह है, जैसे उनका स्वरूप सैकड़ाें वर्ष पूर्व रहा है।
वर्तमान में किला क्षेत्र पर अतिक्रमणकारियाें का बोलबाला है। राजकीय पशु चिकित्सालय किला क्षेत्र के भू-भाग पर बना हुआ है, जिसके बगल में किले का बड़ा भू-भाग है। किला क्षेत्र में छप्पन टीले की भवानी मंदिर भी जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है, जहां राजा भूरिश्रवा पूजा-पाठ करने जाते थे। पहाड़ी और किला क्षेत्र में गुफा भी है।