मेहनत पर मौसम ने पारी फेर दिया। पसीने की बरबादी पर किसान खून के आंसू रोता रहा। सरकारी मदद के लिए दफ्तरों के चक्कर काटता रहा। मगर प्रशासन उनके दुख-दर्द के प्रति उदासीन बना रहा। यह स्थिति तब थी जबकि सरकार ने किसानों के लिए खजाना खोल दिया था। जिले में मुआवजा बांटने के लिए शासन से प्राप्त रकम का महज 56.74 फीसदी ही बांटा गया जबकि लगभग 32.77 करोड़ की रकम बंटी ही नहीं।
वर्ष 2015 के दौरान ओलावृष्टि और अतिवृष्टि से बर्बाद हुई फसलों के मुआवजे के लिए सरकार ने दो वित्तीय वर्ष में 77. 36 करोड़ रुपए जारी किए। यह सहायता राशि जिले के अफसरों और तहसील के कर्मचारियों लापरवाही और चालाकी के चलते 42 फीसदी से ज्यादा रकम बंटी ही नहीं। यह सि्थति तब है जबकि किसान मुआवजे के लिए तहसील का चक्कर लगाते रहे। कई बार उन्होंने धरना-प्रदर्शन भी किया। सहायता के अभाव में कई जरूरी काम रुक गए और अगली फसल बोने के लिए कर्ज लेना पड़ा। इसके बावजूद प्रशासनिक अमला चैन की नींद सोता रहा।
वर्ष 2015 में रबी की फसल के दौरान ओलावृष्टि व अतिवृष्टि से जनपद में भारी तबादी हुई थी। किसानों की सारी फसले बर्बाद हो गई थी। जिसका आकलन कराने के बाद शासन ने वर्ष 2015-16 में 37 करोड़ 76 लाख आठ हजार 45 रुपए का मुआवजा जारी किया। रकम सदर, चुनार, लालगंज तथा मड़िहान तहसील प्रशासन को किसानों में वितरण के लिए भेज दिया गया। तहसील प्रशासन के अधिकरियों ने किसानों को मुआवजा बांटने की बजाय पैसे को डंप रखा।
कुछ किसानों को मुआवजा दिया लेकिन अधिकांश किसान मुआवजा पाने से वंचित रह गए। किसानों को योजना का लाभ पाने के लि विभाग का चक्कर लगाते रहे। खास बात तो यह कि तहसील के स्तर के अधिकारी फाइलों में योजना को दबाए रहे लेकिन जिले के आलाधिकारियों ने भी इसकी सुध नहीं ली। न ही कभी इसकी मानिटरिंग की। अगर इसपर निगरानी रखा गया तो किसानों को आज यह दिन नहीं देखना पड़ता न ही प्रशासन को यह धनराशि शासन को वापस करनी पड़ती।