तूफानी सर्द हवाएं इन दिनों कहर बरपा रही हैं। कड़ाके की ठंड कम होने का नाम नहीं ले रही है। मंगलवार को ज्यों-ज्याें दिन ढलता गया, शीतलहर भी उसी रफ्तार से अपना रंग दिखाया। गलन-ठिठुरन से आम जनजीवन अस्त-व्यस्त हो गया है। ठंडक का असर आम आदमी के साथ ही मवेशियों एवं खेती-किसानी पर भी साफ दिखाई दे रहा है।
वर्तमान समय खेती का सीजन होने के बावजूद किसान एवं मजदूर घराें से नहीं निकल रहे हैं। मवेशी चरागाह जाने के बजाए खूंटे पर ही बंधे रह जा रहे हैं। सबसे बड़ी मुसीबत तो उनके लिए है, जिन्हें रोज रोटी का जुगाड़ करना पड़ता है। मजबूरीवश ठंड में भी हाड़तोड़ मेहनत कर रहे हैं। शीतलहर में अलाव एवं गरीबों को कंबल वितरण के नाम पर सरकारी सुविधा ऊंट के मुंह में जीरा साबित हो रही है। कड़ाके की ठंड से नगरीय सहित ग्रामीण इलाकों के लोगाें की दिनचर्या प्रभावित हो गई है। एहतियात के तौर पर प्रशासन ने स्कूल तो बंद करा रखा है, लेकिन बच्चे घरों के अंदर रजाई में सिमटे रहने को तैयार नहीं हैं। शीतलहर के चलते लोग अपने पूरे शरीर पर गर्म कपड़ो को पहन कर निकलना ही मुनासिब समझ रहे हैं। कड़ाके की पड़ रही ठंड के बावजूद जिला प्रशासन की तरफ से गरीबों और असहायों के बीच गरम कपड़े एवं अलाव जलवाने की मुकम्मल इंतजाम नहीं किया गया है। अखबाराें में रोज बयानबाजी करने वाली स्वयंसेवी संस्थाएं भी ठंड में जिंदगी बसर कर रहे लोगाें की मदद में आगे आते नहीं दिखाई पड़ रही हैं।
सबसे बुरा हाल तो प्राइवेट एवं सरकारी संस्थाओं में काम करने वाले कर्मचारियों का है। हाड़कंपाती ठंड के बावजूद दफ्तर पहुंचना उनकी मजबूरी है।
नगरपालिका प्रशासन ने नगर के चंद चौराहों व बाजारों में अलाव जलवाकर अपनी कर्तव्यों की इतिश्री कर ली।