संत मोरारी बापू ने बुधवार को सप्तमी पर मौन और श्री शक्ति की महिमा का बखान किया। कहा कि मनुष्य अपने कर्मफल को भोगने सृष्टि के मंच पर आता है। यहां आकर अपनी योग्यता के मुताबिक अपनी कला प्रदर्शित करता है। राम और सीता में अंतर नहीं समझना चाहिए। दोनों ही ब्रह्म के स्वरूप हैं औैर एक हैं।
उन्होंने कहा कि राम नाम मोक्ष की प्राप्ति का एक सरल जरिया है। रामनाम से जीव के पाप नष्ट हो जाते हैं और वह मोक्ष की प्राप्ति करता है। उन्होंने देवी के कालरात्रि के स्वरूप की चर्चा करते हुए कहा कि जिस प्रकार गाय अपने बछड़े को चाट कर प्यार करती है उसी प्रकार मां काली अपनी जिह्वा निकाल कर साधकों को चाट कर निर्मल बनाती है। माता के विंध्यवासिनी, महाकाली और अष्टभुजा रूप ब्रहम स्वरूप ही हैं। श्री शब्द भी ब्रहम है। श्री पुल्लिंग और स्त्रीलिंग दोनों है। दोनों ब्रहम एक है। राम भी ब्रहम और सीता भी ब्रहम हैं। सीता ही राम हैं और राम ही सीता हैं। लीला करने के लिए ही राम और सीता बने।
मौन के पांच स्वरूप गिनाते हुए कहा कि मौन में मुस्कुराहट होना चाहिए। मौन में मारुति नंदन का स्मरण करो। यदि कोई मौन में मुस्कुराता है तो समझो उसने बहुत कुछ प्राप्त कर लिया है। हां यह ध्यान रखना होगा कि कोई बच्चा मौन में बात करना चाहता है तो मौन तोड़ देना चाहिए। विंध्य पर्वत और उसके गुरु की चर्चा करते हुए कहा कि किसी को वचन दिया तो उसे निभाना जाना चाहिये। विन्ध्य पर्वत अपने बचन के कारण आज तक लेटा हुआ है। एक श्रोता के प्रश्न का उत्तर देते हुए मोरारी बापू ने कहा कि बुद्धि को धन नहीं विवेक चाहिए। उन्होंने इस पर फिल्मी गीत मै करीब हूं किसी और के, मुझे चाहता कोई और है गुनगुनाया।
मां की मार्केट वैल्यू नहीं होती
विन्ध्याचल। मोरारी बापू ने कहा कि संस्कृत सभी भाषाओं की जननी है। एक श्रोता के प्रश्न का उत्तर देते हुए उन्होंने कहा कि अंग्रेजी की मार्केट वैल्यू हो सकती है लेकिन मां की कोई मार्केट वैल्यू नहीं होती है। एक पुलिसकर्मी ने प्रश्न किया कि बापू रात में ड्यूटी झ्करता हूं तो कथा में नींद आने लगती है तो उन्होंने कहा कि रामकथा लोरी समान है नींद आ जाएगी लेकिन ड्यूटी में मत सोना।
जो कामना न करे वही संन्यासी
विंध्याचल। मोरारी बापू ने कहा कि गृहस्थ जीवन में भीतरी संन्यास धारण करना चाहिए।दिन में गृहस्थ रहो रात को संन्यासी बन जाओ यही धर्म है। जंगल में रहो या घर में हरि नाम का जप करो। कहा कि जो किसी से द्वेष नहीं करता और किसी से कोई कामना भी नहीं करता वही संन्यासी है। एक प्रश्न के जवाब में कहा कि सीता बनना बहुत सरल है लेकिन राधा बनना बहुत कठिन है।