बेबाक व्यक्तित्व के धनी पंडित लोकपति त्रिपाठी यूं तो जिले की दो सीटों से महज दो बार ही जीते लेकिन लोेग आज भी उनको याद करते हैं। यह अनायास नहीं है। भले ही जिले के वोटरों ने उनका एकतरफा साथ न दिया हो लेकिन उन्होंने विकास में कोई कोरकसर नहीं छोड़ी थी। चिकित्सा, सिंचाई और बिजली के लिए उन्होंने काफी काम किया।
राजनीति के पुरोधा पंडित कमलापति त्रिपाठी के पुत्र लोकपति त्रिपाठी को राजनीति विरासत में मिली थी लेकिन इसका उन्होंने कभी नाजायज फायदा नहीं उठाया। उन्होंने अपने दम पर मिर्जापुर जिले की राजनीति में मुकाम कायम किया। उनका जनता से लगातार साबिका बना रहा। क्षेत्र के लोगों की समस्याओं का समाधान कराने के लिए वे तत्पर रहते थे।
हर महीन वे अपने क्षेत्र के लोगों के बीच जरूर जाते थे। वे मझवां और राजगढ़ सीटों से दो बार जीते और हर बार मंत्री बने। सूबे के स्वास्थ्य मंत्री बने तब जिला अस्पताल के विकास के लिए काफी काम किया। मझवां और राजगढ़ इलाकों में सिंचाई की दिक्कत देखते हुए ट्यूबवेल लगवाए। मझवां में बिजली विभाग के बड़े दफ्तर खुलवाये। खेल का मैदान बनवाया।
उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के टिकट पर पहला चुनाव राजगढ़ से लड़ा और जीता। तब उन्हें जेल एवं खेल मंत्री बनाया गया। वर्ष 1977 की जनता लहर में वे राजगढ़ से चुनाव हार गए। वर्ष 1980 में उन्होंने राजगढ़ को छोड़ कर मझवां से पर्चा दाखिल किया और शिवधारी बिंद को 22 हजार मतों के अंतर से करारी शिकस्त दी। वर्ष 1985 के विधानसभा में भी उन्हें मझवां से जीत मिली और वे स्वास्थ्य तथा सिंचाई मंत्री बनाये गए। वर्ष 1989 में जनता दल की लहर में भी लोकपति त्रिपाठी मात्र 54 वोटों के अंतर से हारे। अगली बार उन्हें भागवत पाल ने हराया। 1996 के चुनाव में उन्होंने फिर से राजगढ़ सीट का रुख किया। कांग्रेस- बसपा से गठबंधन के प्रत्याशी के रूप में उन्होंने बीजेपी के गुलाब को करारी शिकस्त दी। पंडित लोकपति त्रिपाठी वर्ष 2002 में अंतिम बार मझवां से चुनाव लड़े जहां उन्हें रमेश बिंद से पराजय मिली।
उनके सहयोगी रहे बरैनी गांव के अखिलेश नारायण सिंह बताते हैं कि लोकपति त्रिपाठी दलालों से सख्त नफरत करते थे। जब वे जान जाते थे कि किसी से दलाली लेकर कोई उनसे काम कराना चाहता है तो वे उस काम को नहीं करते थे। मंत्री रहें हो या विधायक लोकपति जी कभी वाहनों के काफिले में नहीं चलते थे। उनके साथ मात्र एक या दो वाहन ही होते थे।